Saturday, 25 August 2012

मुसाफिर रास्तों पे घर बनाया नही करते ...!!




मेरा काम है चलना ..चलना...और चलते ही रहना ...
मुसाफिर रास्तों पे घर बनाया नही करते ...!!

माना के इस चौराहे पे खड़े इक  अरसा  हो  गया  है ..
हम  इंतज़ार करने वाले हैं ..चौराहों पे उम्र बिताया  नहीं  करते ..!!

तुम्हे यह शिकायत है के हम तुमसे दोस्ती नही करते ...
जिन्हें मंजिल की दूरी का एहसास  हो ..
वो सफ़र में रिश्ते बनाया नहीं करते ..!!

में परिंदा हूँ..मेरा कोई पक्का घर नहीं है ..
जिनके आशियाने बारिश या किसी तूफ़ा के मोहताज हों 
वो अपनी अमीरी पे कभी इतराया नहीं करते...!!

अफ़सोस  के  तुम  भी समझते हो के ..
मुझे मंजिल  का  पता  नहीं  है ..
हमसफ़र होने वाले...यूं' अंदाज़े  लगाया  नही करते..!!

बेशक के  यहाँ  रुकना  मेरी  मजबूरी  थी ..
पर मेरी हिम्मत किसी की मोहताज नही है ..
लम्बी  उड़ान  वाले  परिंदे ..
हर दूसरी शाख पे  बैठ  जाया  नहीं  करते ..!!!

क्या हुआ .. तुम भी तोह मेरे साथ  
इसी मंजिल के सपने देखा करते थे ...
दो तीन दफा गिर गए और वहीँ पे  घर बना लिया.. 
मंजिल पाने वाले सपनों को यूं बेच आया नहीं करते ...!!

मुसाफिर रास्तों पे घर बनाया नहीं करते 
हम इंतज़ार करने वाले हैं..चौराहों पे उम्र बिताया नहीं करते ...!!!

कभी मौका मिले तो बताना..!!!



उस तरफ जाना अच्छा ख़याल है .. 
पीछे देखना अच्छा तजुरबा नही ..
यह दूरी कमबख्त बड़ी दर्दनाक होती है ..!!
तुम्हारी आँखों की चमक मुझसे सही नहीं जाती  ..
जिनमे मेरे आगे बढने की ख़ुशी ...
पर दूर होने की तकलीफ..साफ़ झलकती है  ...!!


मेरी आँखें नाम हो रही हैं इस अलविदा को लिखते लिखते ..
में यह भी जानता हूँ के यह दूरी और वक़्त ..
जल्द ही मुझे पत्थर बना देगी...!!!

कुछ ख्याल हैं जो में अभी बाज़ार करना चाहता हूँ ..
तुम्हारा क़र्ज़ चुकाना मेरे बस की बात कभी न होगी
और मैं भी पागल हूँ  ...
अपनी कविताओं के लोटे में समंदर भरना चाहता हूँ ...!!

कभी मौका मिले तो बताना..इतने खुद्दार कैसे हो ..
कोई जो सारी कायनात मिलकर भी बेच न पाए ...
उसके खरीददार कैसे हो ...!!

कुछ तो कहो यह आंसू तेज़ हो रहे हैं ..
किसी ने पूछ लिया तो कुछ कह न पाएंगे हम ..
कसम खुदा की जो खुदा भी बन गए ..
तुम जैसे न बन पायेंगे हम . .!!

माफ़ करना पलकें अब भारी हो चली हैं ...
इक आंसू बाहर निकलने की फ़िराक में ..
तुम्हारी तस्वीर को धुंधला कर रहा है ....
कलम रोक रही है मुझे कुछ और लिखने से ...
रात फिर परेशान है मेरी इस आदत से
पर माँ.... तुम रहोगी इन आँखों में ...
इनमे रौशनी के रहने तक
तुम रहोगी मेरे ज़ेहन में, नसों में खून रहने तक  ,
तुम रहोगी जिंदा....हाँ.. मेरी हस्ती के मिटने तक
...!!!