ज्यादा अच्छे से नहीं जानता,
पर दिल वैसा ही है
फिसलने वाला, नादान, शरारती
बड़ी बड़ी आँखे ...शायद आज भी हर रोज़
कोई नया सपना देखती होंगी
पर ज़माने की नज़र कहती है
अब वोह लड़की नहीं रही
कौन क्या है, इसका फैसला कौन करता है
मालूम नहीं
जब जब उसके ज़ख्मो को हवा लगती है
जब जब अपने कल से उलझने की कोशिश करती है
हार कर, कोई जवाब न पाकर
कागज़ की एक पर्ची पे कुछ सवाल लिख देती है
वो मासूम अब छिल छिल के पक्की हो गयी है
सख्त हो गयी है
कभी कभी नरम पड़ जाती है
कभी दरारों को भरने की कोशिश करती है
तो कभी उनके होने की वजह जानने की
पर ज़िन्दगी से भला कौन जीता है
फिर जब यह समझती है
एक कागज़ की पर्ची पे कुछ सवाल लिख देती है
अलफ़ाज़ अपने जैसे ही, खूबसूरत, नाज़ुक
लिखकर अपनी डायरी के पन्नो में दफना देती है
किसी से कुछ कहती भी नहीं
इसी सोच में डूबा हूँ
के वो लड़की जिन सवालों को जन्म देती है
खुद उन्ही सवालों को दफना देती है
क्यूँ
वो कागज़ की पर्ची पे ऐसे खेल क्यूँ करती है
लगता है
अब वो भी यकीं करने लगी है
जो ज़माने की नज़र कहती है
के अब वो लड़की नहीं रही !
