कितना खर्च करोगी, कितना जमा करोगी
कितना चलोगी, कब रुकोगी।
ज़माना इन्ही सब सवालों में
मशरूफ था के मेरी,
पहाड़ी के उस पार
समंदर की दूसरी तरफ रहने वाले
इक कीमती पत्थर से मुलाक़ात हो गयी।
आज से पहले शाम इतनी खूबसूरत कभी न लगी।
सड़क मानो मेरे साथ साथ भाग रही हो।
हर कोई मेरी तरफ देखकर जैसे
मन ही मन जल रहा हो।
आधे ज़माने को नींद से जगा कर यह खबर सुनाई है
और इस तरह, के डाकिया भी शर्मा जाये ।
इक अरसे से जो बेचैनी हावी थी
वो हलके धुंए की तरह हवा में कहीं गुम हो गयी है।
जो बेफ़िक्री सर पे सवार थी
उसने कहीं पहुंचा दिया है।
मंजिल तो नहीं कहती पर
मील का पत्थर ज़रूर दिखा दिया है।
दीवारों पे रंग मला जा रहा है।
नजाने कितनी बार अकेले में मुस्कुरा जाती हूँ,
कोई खबर नहीं।
लोग खिची हुई लकीरों के अंदर रंग भरते हैं
उसने तो पूरा कैनवस ही रंगों से भर दिया।
ख़ैर, ख्याल है के पुराने ज़ख्म भुला दिए जाएँ,
शिकायतें वापस ले ली जाएँ।
और कोई मंदिर जा रहा हो तो उससे कहना
उनसे कहदे,
हमारा तुम्हारा ......हिसाब बराबर।
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