यह ऊँट अभी बूढ़ा नहीं हुआ।
इन झुर्रियों पे मत जाओ,
ढीली चाल पे मत जाओ,
झुके कंधों पे मत जाओ,
इक बड़ा अरसा इन्होने
ज़िम्मेदारीआं उठाये रखीं हैं
थक गए हैं।
ईमानदारी ने ना पैसा दिया
न शोहरत, न बड़ा घर।
पर सकून भी किसी चीज़ का नाम होता है।
अपनी ईमानदारी और कुर्बानियों पे नाज़ से है जो
आँखों में देखना
शायद थोड़ी सी वो चमक दिखा जाये।
बालों की इस सफेदी पर भी न जाना
ये उम्र के हिसाब से नहीं
ख्यालों की गहराई से रंग बदलते हैं
कुछ किस्से ज़हन से कभी जुदा नहीं होते।
हर महीने अपनी लाटरी के नतीजे निकलने का
वो बेसब्री से इंतज़ार
सब बच्चे पीछे तैयार रहते थे
शाम को घर में मारुती कार आएगी
पर कुछ ख्वाहिशें कितनी भी सच्ची हों
शौंक जितने भी बड़े हों
सपने अखबार के इश्तेहारों में नहीं बिका करते
और चूँकि सपने खरीदकर नहीं देखे जाते
इसलिए उनके पूरे न होने पर
अफ़सोस नहीं किया जाता
पर ऐसा ही है शायद
अब बस झुके हुए कंधे ही हैं
सब कहाँनी कहने को
अब न ज़िम्मेदारियाँ रही न बाप
बस नज़रें मिलाकर उनका कहना
किसी चीज़ की कमी न होगी
बस
तब से एक सकूँ सा है
जैसे किसी फ़रिश्ते ने
पर्ची पे लिख कर
कोई वादा दे दिया हो
पर शिकायत यही है
ज़म्मेदारियां ख़त्म होती हैं
आदमी कब्र के बहुत करीब आ जाता है
पर कुछ मलाल कभी नहीं मरते
माँ को भी कोई शिकायत नहीं थी
एक दफा बीमार हुई थी
इलाज के लिए पैसों पे कोई चर्चा हो
उससे पहले ही उसकी बहु ने अपने ज़ेवर
सुनार को बिजवा दिए
उसे भी कोई शिकायत न थी
जाते वक़्त उसके मुँह से भी बस दुआ ही निकली
बहुत याद आती है
कंधे झुक चुके हैं
फिर भी लगता है कुछ और उठाना बाकी था
कभी कभी बहुत कस के रोना आता है
सोचता हूँ
ज़िंदा होती तोह पाँव पकड़ के माफ़ी मांग लेता
हर रोज़ ऐसे ही किसी ख्याल से दिन शुरू होता है
कि वो होती तो ऐसा
इन झुर्रियों पे मत जाओ,
ढीली चाल पे मत जाओ,
झुके कंधों पे मत जाओ,
इक बड़ा अरसा इन्होने
ज़िम्मेदारीआं उठाये रखीं हैं
थक गए हैं।
ईमानदारी ने ना पैसा दिया
न शोहरत, न बड़ा घर।
पर सकून भी किसी चीज़ का नाम होता है।
अपनी ईमानदारी और कुर्बानियों पे नाज़ से है जो
आँखों में देखना
शायद थोड़ी सी वो चमक दिखा जाये।
बालों की इस सफेदी पर भी न जाना
ये उम्र के हिसाब से नहीं
ख्यालों की गहराई से रंग बदलते हैं
कुछ किस्से ज़हन से कभी जुदा नहीं होते।
हर महीने अपनी लाटरी के नतीजे निकलने का
वो बेसब्री से इंतज़ार
सब बच्चे पीछे तैयार रहते थे
शाम को घर में मारुती कार आएगी
पर कुछ ख्वाहिशें कितनी भी सच्ची हों
शौंक जितने भी बड़े हों
सपने अखबार के इश्तेहारों में नहीं बिका करते
और चूँकि सपने खरीदकर नहीं देखे जाते
इसलिए उनके पूरे न होने पर
अफ़सोस नहीं किया जाता
पर ऐसा ही है शायद
अब बस झुके हुए कंधे ही हैं
सब कहाँनी कहने को
अब न ज़िम्मेदारियाँ रही न बाप
बस नज़रें मिलाकर उनका कहना
किसी चीज़ की कमी न होगी
बस
तब से एक सकूँ सा है
जैसे किसी फ़रिश्ते ने
पर्ची पे लिख कर
कोई वादा दे दिया हो
पर शिकायत यही है
ज़म्मेदारियां ख़त्म होती हैं
आदमी कब्र के बहुत करीब आ जाता है
पर कुछ मलाल कभी नहीं मरते
माँ को भी कोई शिकायत नहीं थी
एक दफा बीमार हुई थी
इलाज के लिए पैसों पे कोई चर्चा हो
उससे पहले ही उसकी बहु ने अपने ज़ेवर
सुनार को बिजवा दिए
उसे भी कोई शिकायत न थी
जाते वक़्त उसके मुँह से भी बस दुआ ही निकली
बहुत याद आती है
कंधे झुक चुके हैं
फिर भी लगता है कुछ और उठाना बाकी था
कभी कभी बहुत कस के रोना आता है
सोचता हूँ
ज़िंदा होती तोह पाँव पकड़ के माफ़ी मांग लेता
हर रोज़ ऐसे ही किसी ख्याल से दिन शुरू होता है
कि वो होती तो ऐसा
No comments:
Post a Comment