Wednesday, 10 October 2012

इस रात को निकल जाने दो...!



इस रात को निकल जाने दो, उन्हें जी भर के बातें बनाने दो ..
जो दोस्त भी कहते हैं और तन्ज़ भी करते हैं...
उन्हें अपना असली चेहरा तो दिखाने दो ..!
और..जो कल सुबह होते ही इंसान हो जायेंगे 
उन्हें आज थोड़ी सी हैवानियत दिखाने दो ...!

कोई वजह होगी कि इंसानियत के 
मायिने समझने में नाकाबिल रहे वो...
मतलब  और मौकापरस्ती में लिपटी 
अपनी हैसियत का जलवा दिखाने दो ..!!

ये बंजर ज़मीं कभी तो नरम घास होगी..
तो आज रात हमे कांटो पे चल जाने दो..
जो कल सुबह होते ही फिर से मासूम हो जायेंगे 
उन्हें आज अपने गुनाहों का किस्सा सुनाने दो ..!

मुद्दत हो गयी यह फरेब करते करते 
अब इस राज़ से पर्दा उठ जाने दो.. 
सुबह होते ही जो नज़रों से गिर जायेंगे..
उन्हें आज रात  जी भर के दोस्ती क़ी कसमें खाने दो ..!

तुमने क्या समझा था और क्या हो गया साहिल 
खैर मरम्मत हो ही जायेगी...
मलबे को किनारे तक तो आने दो..
सुबह तक जुड़कर जो फिर से नाव हो जायेंगे 
उन टुकड़ों पर कील हथोडा कुछ तो चलाने दो ..
और ...लहरें बहा के इस नाव को जहां फिर से ले जायेंगी..
आज रात उस भंवर को जी भर के जश्न  मनाने  दो ...!!!  

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