Wednesday, 19 September 2012

तुम्हारा शहर...! ! ! !


बड़ा शहर...बड़े लोग...अंग्रेजी...पैसा ..
तुम्हे तो यह सब कभी लुभाता न था .....
खैर किसी शहर की चमक ने,
अमीरों की जुबां ने तुम्हे खरीद लिया 
होगा ..
या शायद 
तुम कभी मेरे थे ही नहीं ....
मैं गोपी से 'अनपड़ गोपी' हो गया
और तुम 'मुन्नी' से मोनिका ... 
सच कहूँ तो कोई और है जो  मेरा सब कुछ है
वोह मुझे शर्तों पे प्यार नहीं करती...
मुझसे रूठना जिसके बस में ही नहीं... 
और मुझे देख देख कर जिसकी आँखें खुलती हैं...
मेरी उस माँ को अंग्रेजी बोलना नहीं आता ....

हमारे यहाँ तो प्यार गूंगे भी करते हैं  ....
फिर तुम क्यूँ  इस हुनर से महरूम रह गए ...
या बड़े शहर के लोगों को
बिना सहारों के जीना नहीं आता  ..

क्या बात है तुम्हारे शहर की ...
'बबलू' जहाँ 'छोटे' हो गया ...
'ओ माँ ' जहां 'o crap
' हो गया..
उस शहर में कोई तो मुझ जैसा होगा
जिसे अंग्रेजी बोलनी नहीं आती होगी
जिसे कोई दोस्त न बनाता  होगा ...
जिसकी माँ तोह उसे 'मेरा अँगरेज़ बेटा' कहती होगी ..
पर जिसे तुम्हारा शहर गंवार बताता होगा ......!!!  
पर शहर भी तो कभी
अपनी माँ के पहलु में जाता होगा
या फिर बड़ी बड़ी पत्थर की इमारतों में बसे
शेहरीयों की माँ होती ही नहीं है ....
मैंने सुना है वहाँ 'mom' नाम की एक औरत घर में होती है..
कभी  कभी त्यौहार के दिन जिसके पाँव छुए जाते हैं....

मैं कितना खुशनसीब हूँ ...
मेरे घर पे रोटी पकने पर आवाज़ गूंजती है
गोपी खाना तैयार है....
रूठना होता है ..मनाना होता है...
फिर कभी कभी हाथों से खिलाना होता है...
तुम्हारे यहाँ ऐसा होता है क्या....
सुना है वहाँ खाना भी 'डेलिवर' होता है...
कहानियाँ  सुनाते  हैं  लोग  वहां  सितारों  की ,
किस्से  नहीं  सुनाई  देते  जहां दिल के  ....
सुना है वहाँ आदमी बहुत हैं ..पर...
इन्सां दूंदने पर भी नहीं मिलते...!!


अच्छा है ....तुम्हारा शहर....तुम...यह इमारतें...
मुझे कोई शिकायत नहीं है  इससे ,
जैसा भी  है ..!!
अच्छा है...बहुत  अछा  है ....
पर  मुबारक है...तुम्हे.. तुम्हारा शहर...!!!   

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