हमेशां टूटने की ही बात क्यूँ करते हो...
हारने की..बिखरने की बात ही क्यूँ करते हो...
अपनी खिड़की से परदा हटाओ, शीशे से धूल छांटो
और देखो हवा में कितनी उमंग है ....!!
छोटी छोटी टहनियां कैसे आँधियों को चुनौती दे रही हैं..
बिजली की तार पे बैठा कबूतर, कैसे अपने पंखों से
तूफानी बारिश का सामना कर रहा है ....!!!
काले समंदर की उफनती लहरों के बीचो बीच
कोई मछुआरा कैसे अपने जीने के साधन जुटा रहा है ...
और एक तुम हो ..
जो अपने रौशनदान पर भी परदा डाले बैठे हो..!!
मैं मानता हूँ ..
दिल टूटना बड़ा दर्दनाक मंज़र होता है
पर ज़िन्दगी के माईने ही खो जाएँ जिसमे
इतना गहरा भी कोई ज़ख्म नहीं होता ....!!!
अरे ..हारना , गिरना तो
मंजिल का अभ्यास करने के भांति होता है..
बाकी यह तो समझ समझ की बात है..
वरना ऐसे तो...
जिंदा रहना भी एक हुनर होता है ..!!
तुम इस अँधेरे से मत डरो...
इक छोटी सी चिंगारी ही काफी है
इसकी हस्ती मिटाने के लिए..!!
और यह बला जिसे मंजिल कहते हैं,
इतनी भी पत्थर दिल नहीं होती
कभी कभी दो कदम यह भी चल लेती है,
अपने आशिक को पाने के लिए ....!!!

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