Sunday, 9 September 2012

तस्वीर और शिकायत

 
वो हमेशां उस तस्वीर में रंग भरने की बात किया करती थी ..
और मैं उस ख्याल की तामीर भी करता...

पर मेरे रंग भरने के तरीके से वो थोड़ा नाखुश रहती...
अक्सर रंग फैल जाया करता था....
खिंची हुई लकीरों से कई आगे ...बहता बहता 
कैनवस् से बाहर निकल जाया करता था....

शायद हमारी नज़र और सोच में थोड़ा फर्क था 

मुझे लगता ...जितना प्यार उतनी ख़ुशी
                          
जितनी मोहब्बत उतना सकूं 

पर वो तस्वीर को तस्वीर समझती थी ...
   
और मैं ..ज़रुरत से ज़्यादा समझता था ...!



कितनी कोशिशें हुई ..
  उस तस्वीर में रंग भरने की 

       हर बार फैलते हुए रंगों के नीचे आकर....
     खिची हुई लकीरें अपना दम तोड़ देतीं ...
     और उसका...दिल टूट जाता ...!!!!



फिर दिल टूटने का और नाकामियों का सिलसिला भी टूट गया ...
        रास्ते अलग हुए .. तो रंग भी सिमटने लगे...
        आज वो अच्छी चित्रकार है ...और मैं उम्दा शायर...!!!  

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