Friday, 21 December 2012

कोशिश करता तो शायद....!!


वोह खिड़की से अपनी झांकता ही रहा 
मुझ जैसा जो कभी न बन पाया
मेरे घर की और पत्थर वो उछालता ही रहा ।।

बाहर निकलता तो शायद रास्तों से मुलाकात हो ही जाती 
बड़े बड़े ख़ाब देखने वाला 
छोटी छोटी नहरें पार करने से कतराता ही रहा ।।

कभी दौड़ा नहीं .. सीड़ी न चढ़ा ..कभी पतंगें भी उड़ाई नहीं 
हवा, शरारत, खेल , मुकद्दर ...
इन सब से शिकायत बस करता ही रहा।

कोशिश करता तो शायद उस आग पे काबू पा ही लेता 
पर घर के भीतर बैठा .. 
वो अन्दर से भी जलता रहा, 
वो बाहर से भी जलता रहा।।

तकलीफ में देखकर भीड़ ने उसे अनदेखा कर दिया  
अंजाम और होता भी क्या
तमाम उम्र दोस्तों को अपने परखता जो रहा ।।

कोशिश करता तो शायद उस आग पे काबू पा ही लेता 
पर घर के भीतर बैठा .. 
वो अन्दर से भी जलता रहा, 
वो बाहर से भी जलता रहा।।

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