Sunday, 30 December 2012

जो मेरे बस में होता।

                                         


 वोह मोहल्ला मैं कभी न छोड़ता, 
 जो मेरे बस में होता। 
 आज भी उन्ही दोस्तों संग होता, 
 जो मेरे बस में होता।

 अब ख्यालों में ही जिंदा हैं, 
 वोह ज़माने शरारतों के, 
 वरना आज भी 
 बड़ी बहन के आने से पहले 
 तकिये के नीचे 
 टीवी का रिमोट छुपा रहा होता 
 जो मेरे बस में होता ।

 इन रास्तों पे चलना मेरी जिद्द थी 
 और जूनून आज भी जिंदा है।
 पर इतनी दूर ले आयेंगे, 
 यह मालूम गर होता 
 रास्ते ही बदल देता, 
 जो मेरे बस में होता। 
 
 यह तंदूर की सख्त रोटी  
 मुझसे चबाई नहीं जाती 
 कुछ सजा है, कुछ किस्सा मुकद्दर है
 वरना आज भी तेरे पहलु में होता, 
 उस छोटी सी रसोई में 
 उस गरम चटाई पे बैठा होता, 
 तेरे हाथ की पकी गरम रोटी खा रहा होता  
 नम पलकें और इस नज़्म की जगह 
 कोई गीत गुनगुना रहा होता, 
 जो मेरे बस में होता।
 
 मेरा रोना चिलाना काफी नहीं है
 उन तमाशों को दुहराने के लिए, 
 हालात कब का बदल चुका  होता 
 जो मेरे बस में होता।
 
 वोह मोहल्ला मैं कभी न छोड़ता, 
 जो मेरे बस में होता। 
 आज भी उन्ही दोस्तों संग होता, 
 जो मेरे बस में होता।
  

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