Monday, 26 August 2013

तुम्हारे ही कागज़ पे लिखे

तुम्हारी ही कलम है यह,
तुम्हारे ही कागज़ पर लिखे,
अलफ़ाज़ तुम्ही से उधार लिए हैं।
इस नज़्म में बस ख्याल मेरे हैं,
पर वोह भी मेरी उपज नहीं हैं,
वजूद भी इनका तुम्ही से है।

फिर मेरा तोह कुछ रहा नहीं,
और मैं भी मैं अब रहा नहीं।
के मेरा तुझमे खो जाना,
मेरा ही पूरा होना है।

मेरे बदन से तेरे बदन तक,
मेरे ज़हन से तेरे ज़हन तक,
क्या सफ़र था क्या नज़ारा।
..................................
सवाल, शिकायतें, इलज़ाम, रंजिशें,
एक होने की राहत में,
दिल ने सब खारिज करदीं।

एक नज़र से दुनिया देखी
उसी नज़र से खुद को देखा।
कितना अच्छा मंज़र है यह
कितना पाकीज़ा ख्याल है यह।
........................................
पर ख्याल भी तोह मेरा नहीं हैं
और कलम भी नहीं है मेरी।
तुम्हारे ही कागज़ पे लिखे
लफ्ज़ तुम्ही से उधार लिए हैं।
...................................
प्यार करने का वक़्त हुआ है
चलो लिखना अब बंद करते हैं।

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