Thursday, 19 September 2013

अब मेरे घर में जुगनू नहीं आते

अब मेरे घर में
जुगनू नहीं आते
कुछ रोज़ पहले
मोहल्ले में
बड़े बड़े बिजली के
खंभे लगाये गए थे
इक लाल पीली तार
से लटका हुआ
कांच का इक गेंद
हमारी छत से नीचे
लटका दिया गया
रात होती है,
ज़ोर ज़ोर से जलने लगता है
बहुत रौशनी करता है
पर उसके अन्दर की आग
बाहर नहीं आती।

कमरे मैं रक्खी तमाम चीज़ें
दिखने लगती हैं
दादी का चरखा,
माँ का चूल्हा,
बाबा का फावड़ा
दादी का चरखा
चावल का टीपा
सब दिखता है
बस वो जुगनू दिखाई नहीं देते।
लगता है साथ वाले
गाँव में चले गए
कोई कह रहा था,
नक्सिलयों का गाँव है
वहां बिजली के
खम्बे नहीं लगेंगे।

मुझे भी वहीँ जाना है
वैसे भी ऐसी रौशनी से
कमरे का अँधेरा मिटता है
तकदीर नहीं
मुझे मालूम है
के मुझे भी
नक्सली कहा जायेगा
पर ज़मींदार और सरकार
क्या सोचते हैं
इससे मुझे कोई गरज नहीं
मुझे बस इस घर में नहीं रहना
यह घर अब मुझे
अच्छा नहीं लगता
.......................
इस घर में अब जुगनू नहीं आते।    

No comments:

Post a Comment