अब मेरे घर में
जुगनू नहीं आते
कुछ रोज़ पहले
मोहल्ले में
बड़े बड़े बिजली के
खंभे लगाये गए थे
इक लाल पीली तार
से लटका हुआ
कांच का इक गेंद
हमारी छत से नीचे
लटका दिया गया
रात होती है,
ज़ोर ज़ोर से जलने लगता है
बहुत रौशनी करता है
पर उसके अन्दर की आग
बाहर नहीं आती।
कमरे मैं रक्खी तमाम चीज़ें
दिखने लगती हैं
दादी का चरखा,
माँ का चूल्हा,
बाबा का फावड़ा
दादी का चरखा
चावल का टीपा
सब दिखता है
बस वो जुगनू दिखाई नहीं देते।
लगता है साथ वाले
गाँव में चले गए
कोई कह रहा था,
नक्सिलयों का गाँव है
वहां बिजली के
खम्बे नहीं लगेंगे।
मुझे भी वहीँ जाना है
वैसे भी ऐसी रौशनी से
कमरे का अँधेरा मिटता है
तकदीर नहीं
मुझे मालूम है
के मुझे भी
नक्सली कहा जायेगा
पर ज़मींदार और सरकार
क्या सोचते हैं
इससे मुझे कोई गरज नहीं
मुझे बस इस घर में नहीं रहना
यह घर अब मुझे
अच्छा नहीं लगता
.......................
इस घर में अब जुगनू नहीं आते।
जुगनू नहीं आते
कुछ रोज़ पहले
मोहल्ले में
बड़े बड़े बिजली के
खंभे लगाये गए थे
इक लाल पीली तार
से लटका हुआ
कांच का इक गेंद
हमारी छत से नीचे
लटका दिया गया
रात होती है,
ज़ोर ज़ोर से जलने लगता है
बहुत रौशनी करता है
पर उसके अन्दर की आग
बाहर नहीं आती।
कमरे मैं रक्खी तमाम चीज़ें
दिखने लगती हैं
दादी का चरखा,
माँ का चूल्हा,
बाबा का फावड़ा
दादी का चरखा
चावल का टीपा
सब दिखता है
बस वो जुगनू दिखाई नहीं देते।
लगता है साथ वाले
गाँव में चले गए
कोई कह रहा था,
नक्सिलयों का गाँव है
वहां बिजली के
खम्बे नहीं लगेंगे।
मुझे भी वहीँ जाना है
वैसे भी ऐसी रौशनी से
कमरे का अँधेरा मिटता है
तकदीर नहीं
मुझे मालूम है
के मुझे भी
नक्सली कहा जायेगा
पर ज़मींदार और सरकार
क्या सोचते हैं
इससे मुझे कोई गरज नहीं
मुझे बस इस घर में नहीं रहना
यह घर अब मुझे
अच्छा नहीं लगता
.......................
इस घर में अब जुगनू नहीं आते।
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