Thursday, 3 October 2013

दरया मुझसे रूठ गया है

एक समंदर पास खड़ा है
एक समंदर दूर खड़ा है
पर दरया मुझसे रूठ गया है
जब से गए हैं बाँध बना के
सरकार ......
या उसके ठेकेदार बना के
मकान बाकी बचे हैं सारे
मोहल्ला हमारा टूट गया है

समंदर की चौकीदारी का
जबसे मैंने ठेका लिया है
गाँव मुझसे नफरत करता है
सब कुछ मेरा  छूट गया है
पैसा कमाना मजबूरी था
इस मौसम
दाना कचा ही टूट गया है

निगरानी आँखों से करता हूँ
अब दिल मेरा भी टूट गया है
 बाड़ आएगी हम डूबेंगे
और डूबेगी अपनी झुग्गी
मुआवजा ..........
नजाने किसको मिलेगा
भारत का निर्माण होगा
तुमने हमसे झूट कहा है

समंदर की निगरानी के
खेल से जब से पर्दा उठा है
साहिल से होकर शर्मिंदा
समंदर खुद में डूब गया है

हमारे भले की बात न करना
मना लिया है रूठे जंगल को
पर तुमसे तुम्हारा ........
आखिरी मौका छूट गया है।

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