Thursday, 3 October 2013

आखिरी फरेब

आखिरी फरेब है
तझे पा लिया,
या खो दिया।
सुबह आँख खुलेगी
मालूम हो जायेगा
मेरी मजबूरी है
और तेरा यकीन अभी कचा है।
इक आखिरी झूठ का
सहारा लेना बाकी है
सुबह आँख खुलेगी
सच सामने आ जायेगा।

मंज़ूर अभी से ही है मुझे फांसी की सज़ा।
कौन देखेगा कल सुबह तक
तेरा क्या है फैसला।

आखिरी फरेब है तुझे करीब लाने के लिए,
जताने का बस यही तरीका है।
तुझे हासिल करना मेरा मकसद नहीं।
उम्मीद तुझसे कोई नहीं है,
मेरे ख़त तो तूने पढ़े नहीं,
अश्क तोह तुझे दिखे नहीं,
मेरी इबादत का क्या ख़ाक समझेगा।

वैसे भी तुझे यह सब फरेब ही लगता है।
और तुझे जब यह सब फरेब ही लगता है,
इक आखिरी फरेब और सही।
सुबह आँख खुलेगी,
मालूम हो जाएगा। 

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