Thursday, 3 October 2013

पर वो कुछ बोलेगा नहीं

कितना ज़रूरी था मेरी आबादी को
उसकी मौत का सबब बनना।
कभी कभी इत्तेफाक
साज़िश का शिकार हो जाया करते हैं।
यह बात वोह अच्छे से जानता है
जो इनके जनाज़े में भी शामिल था
और उनकी महफ़िल में भी।
कभी कभी काजी भी
राह-ऐ-काबा भूल जाया करते हैं।

कितना लाज़िम है इनकार करना,
उस मुजरिम का ऐतबार करने से
यहाँ कौन मुजरिम नहीं है।
और उसका जुर्म यह नहीं
के वोह कातिल है
उसका गुनाह यह है के
वोह कैदी हो गया है
तुम्ही हो जो यकीन कर सकते हो
पर नजाने कैसे इमाम हो
दोज़क की धमकियां देते हो
जन्नत का रास्ता नहीं
दिखाते
याद रखना कैदी तुम भी हो
इस नहीं तोह उस अदालत के, यकीनन हो।

और वहाँ न सरकारी वकील मिलेंगे
न दूकान वाले।
तुम्हे गवाही नहीं देनी है ..
सिर्फ उसकी दलील सुननी है
माकूल हो या ना-माकूल।
किसी को मौत दी जा रही है।
उसे इतना तो कहने का मौका दीजिये,
मैं अपने जुर्म का इकबाल करता हूँ।

कितना ज़रूरी है
उसकी गर्दन का कलम होना
क़त्ल का बदला क़त्ल, इन्साफ नहीं है
और मुजरिम को ख़त्म करना
जुर्म है, सज़ा नहीं है।  

वोह सब जानता है
वही ....
जिसने क़त्ल किया है।
गवाह भी है
और अब फैसला सुना रहा है।
पर वो कुछ बोलेगा नहीं।

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