Wednesday, 16 October 2013

बड़ी पुरानी हसरत थी

हसरत मरती नहीं है
जब तक जिंदा रहती है 
उलझा के रखती है 

कल के अँधेरे में 
खोया गीत 
कल के सन्नाटे में 
खोयी ग़ज़ल
दिए जलाने पर, 
ढोल पीटने पर, 
ख़ामोशी की जंजीरों को
न तोड़ पाते हैं,
न उनसे निकल पाते हैं।

कुछ शक्लें पर जिंदा रह जाती हैं.
जो कल से चल कर आज तक
पहुँचती हैं,
पर शक्सियत का बोझ नहीं उठा पाती
वफ़ा की दौड़ लम्बी होती है
हर कोई नहीं दौड़ पाता।

तुम्हारा मुझसे कहना
के तुम्हे आज भी मुझसे मोहब्बत है
तुम्हारे ही
लिए तुमसे दूर हुई थी
कितना सच है कितना फरेब।
चलो मान लिया, मुआफ़ भी किया
लो, उठाओ, लेजाओ इस लाश को
दफनाई हुई मोहब्बत
कब्रों से निकाली नहीं जाती।

पर तुम्हारी आज की
इस मुलाकात का
क़र्ज़ है मुझपर
बड़ी पुरानी हसरत थी
तुम्हे जी भर के देखने की
तुम्हारी, अब ठहर चुकी, नज़रों को
ज़हन में भरने की...

बस यही वजह थी इस खेल की
बड़ी पुरानी हसरत थी
और हसरत मरती नहीं
जब तक ज़िंदा रहती है
उलझा के रखती है।

: रमणीक सिंह

पैसा समझता, तो सब कुछ होता!!!

शब्दों से जीत न सके 
रंग पे आगये, 
पैसे की फितरत होती है 
गरीबी से दोस्ती नहीं करता 
मज़ाक करता है 
सौदा करता है। 
अच्छा हुआ, 
तुम अपने असल पे उतर आये 
मुफलिसी की फितरत है ऐतबार करना 
खरीदने की बात नहीं करती 
दोस्ती करना जानती है,
खुश रहती है
मुफलिसी चालाक हो जाती है
खज़ाने की हिफाज़त का
वक़्त आजाता है
अशर्फियाँ खायी नहीं जाती
पैसा समझता
तो सब कुछ होता!!!

मुफलिसी : poverty
अशर्फियाँ : Currency/money

Thursday, 3 October 2013

पर वोह गवाही नहीं देगा।

तुम जो मेरे साथ
इतने दिनों से इस सफ़र पे हो
तुम ही बताओ
क्या में भी किसी रंजिश का हिस्सा हूँ
किसी इंतेकाम के रास्ते पे हूँ
या किसी मकाम की जिद्द पे।
तुम्हे तो इल्म होगा ही
मुझे भूलने की आदत है
इसी के चलते इक मर्तबा
कहीं से बहुत से पैसे लेकर आया था
पर
ज़मीर खोकर अमीर होने का ख्याल
मेरा नहीं हो सकता
तुमने बेशक मुझे मजबूर किया होगा
पर मेरी साँसों के रुकने से
तेरी मौत तो न होगी
यह तोह वही जानता है
जो तुझमे भी है
और मुझमे भी
पर वो बोलेगा नहीं
मुझे आज भी याद है
रज्जो का कहना सही था
आबरू से ऊपर कुछ नहीं होता है
हमारी मोहब्बत को फना होना ही होगा
कीमत यही है अदा करनी ही होगी
हम भगावत नहीं करेंगे
बल्लू ने आखिरी बार उसे गले लगाया
और कभी उस तरफ नहीं देखा
कहानी कोई नहीं जानता आगे की
एक हो तो कोई खबर रखता
नजाने कितने बल्लू
कितनी रज्जो
ख़ामोश, दिल में कोई वास्ता दबाये हुए
सूली चढ़ गए
ज़रा गौर से देखो इसपर मोटे मोटे अक्षरों मेंन
अभिमान और मर्यादा लिखा हुआ है
हाँ दरोगा साहब
यही है वो सूली जिसपर टांग दिए गए
दो लोग जिन्हें वहम हो गया था
के वो आज़ाद हैं।

सब देखा है उसने
जो इनके जनाज़े में भी शामिल था
और कातिलों की महफ़िल में भी
पर वोह गवाही नहीं देगा।  

पर वो कुछ बोलेगा नहीं

कितना ज़रूरी था मेरी आबादी को
उसकी मौत का सबब बनना।
कभी कभी इत्तेफाक
साज़िश का शिकार हो जाया करते हैं।
यह बात वोह अच्छे से जानता है
जो इनके जनाज़े में भी शामिल था
और उनकी महफ़िल में भी।
कभी कभी काजी भी
राह-ऐ-काबा भूल जाया करते हैं।

कितना लाज़िम है इनकार करना,
उस मुजरिम का ऐतबार करने से
यहाँ कौन मुजरिम नहीं है।
और उसका जुर्म यह नहीं
के वोह कातिल है
उसका गुनाह यह है के
वोह कैदी हो गया है
तुम्ही हो जो यकीन कर सकते हो
पर नजाने कैसे इमाम हो
दोज़क की धमकियां देते हो
जन्नत का रास्ता नहीं
दिखाते
याद रखना कैदी तुम भी हो
इस नहीं तोह उस अदालत के, यकीनन हो।

और वहाँ न सरकारी वकील मिलेंगे
न दूकान वाले।
तुम्हे गवाही नहीं देनी है ..
सिर्फ उसकी दलील सुननी है
माकूल हो या ना-माकूल।
किसी को मौत दी जा रही है।
उसे इतना तो कहने का मौका दीजिये,
मैं अपने जुर्म का इकबाल करता हूँ।

कितना ज़रूरी है
उसकी गर्दन का कलम होना
क़त्ल का बदला क़त्ल, इन्साफ नहीं है
और मुजरिम को ख़त्म करना
जुर्म है, सज़ा नहीं है।  

वोह सब जानता है
वही ....
जिसने क़त्ल किया है।
गवाह भी है
और अब फैसला सुना रहा है।
पर वो कुछ बोलेगा नहीं।

आखिरी फरेब

आखिरी फरेब है
तझे पा लिया,
या खो दिया।
सुबह आँख खुलेगी
मालूम हो जायेगा
मेरी मजबूरी है
और तेरा यकीन अभी कचा है।
इक आखिरी झूठ का
सहारा लेना बाकी है
सुबह आँख खुलेगी
सच सामने आ जायेगा।

मंज़ूर अभी से ही है मुझे फांसी की सज़ा।
कौन देखेगा कल सुबह तक
तेरा क्या है फैसला।

आखिरी फरेब है तुझे करीब लाने के लिए,
जताने का बस यही तरीका है।
तुझे हासिल करना मेरा मकसद नहीं।
उम्मीद तुझसे कोई नहीं है,
मेरे ख़त तो तूने पढ़े नहीं,
अश्क तोह तुझे दिखे नहीं,
मेरी इबादत का क्या ख़ाक समझेगा।

वैसे भी तुझे यह सब फरेब ही लगता है।
और तुझे जब यह सब फरेब ही लगता है,
इक आखिरी फरेब और सही।
सुबह आँख खुलेगी,
मालूम हो जाएगा। 

दरया मुझसे रूठ गया है

एक समंदर पास खड़ा है
एक समंदर दूर खड़ा है
पर दरया मुझसे रूठ गया है
जब से गए हैं बाँध बना के
सरकार ......
या उसके ठेकेदार बना के
मकान बाकी बचे हैं सारे
मोहल्ला हमारा टूट गया है

समंदर की चौकीदारी का
जबसे मैंने ठेका लिया है
गाँव मुझसे नफरत करता है
सब कुछ मेरा  छूट गया है
पैसा कमाना मजबूरी था
इस मौसम
दाना कचा ही टूट गया है

निगरानी आँखों से करता हूँ
अब दिल मेरा भी टूट गया है
 बाड़ आएगी हम डूबेंगे
और डूबेगी अपनी झुग्गी
मुआवजा ..........
नजाने किसको मिलेगा
भारत का निर्माण होगा
तुमने हमसे झूट कहा है

समंदर की निगरानी के
खेल से जब से पर्दा उठा है
साहिल से होकर शर्मिंदा
समंदर खुद में डूब गया है

हमारे भले की बात न करना
मना लिया है रूठे जंगल को
पर तुमसे तुम्हारा ........
आखिरी मौका छूट गया है।