Tuesday, 29 January 2013

कोई बड़ी नादानी करते हैं



चल आज फिर कोशिश करते हैं 
बचपन तो वापिस मिलने से रहा 
कोई बड़ी नादानी करते हैं 
बिन धर्म जात रंग रूप उम्र 
जहां दिल फिसले वहां गिरते हैं 

घुटना कोहनी या फिर दिल 
छिल जाये तो भी हस्ते हुए 
उठके फिर सीधे चलते हैं 

गलती कर समझदार संभलते
नासमझ बन चल फिर से यार
गिरने की तय्यारी करते हैं 
सँभलने में कुछ मज़ा नहीं 
बेसुद्ध होकर के चलते हैं

नाम बनाने की कोशिश में
कितना वक़्त बर्बाद  किया
नादान बन कोई गलती कर
हो बदनाम घर से निकलते हैं
बचपन तो वापस मिलने से रहा 
कोई बड़ी शरारत करते हैं "

No comments:

Post a Comment