कुछ देर मुझसे कोई सवाल न करना ..
कुछ देर मुझसे कोई हिसाब न करना ..
एक क़त्ल की तफ्तीश में मशरूफ हूँ मैं ..
तुम कहते हो ..
मेरे अन्दर जो इंसा रहता था ..
उसे मैंने मारा है .
पर ऐ शहर........बेक़सूर हूँ मैं।
पर ऐ शहर........बेक़सूर हूँ मैं।
कुछ देर ऐ दर्द, मुझे तंग न करना ..
थोड़ा सहमा हुआ हूँ, अभी बेसुद्ध हूँ ..
कुछ सोच रहा हूँ
किसी के एहसानों का
हिसाब कर रहा हूँ ..
हिसाब कर रहा हूँ ..
मैं दिल हूँ।
ऐ जज़्बात कुछ देर मुझसे दूर रहना ..
आज फैसला पढ़े लिखे, नए दौर के लोग करेंगे
ज़खम नज़र अंदाज़ करना सीख ..
दर्द जब तक जान न लेले, मूह न खोल
में भी यही सीख रहा हूँ
मैं दिल हूँ।
उस ज़माने की याद है, ऐ दोस्त
चप्पल पहनना भूल गए थे
उसे गाड़ी चढ़ाने जब आये थे।
कोई ख़त तो उसने लिखा न था ..
उसकी अलमारी से उसकी कमीज़ चुरा ले आये थे।
कितने झूठ बोले थे हमने ..
मज़ाक बन रह गए थे हम।
और बार बार आइना देखने की वो आदत
....तौबा ...
....तौबा ...
पर नजाने कैसा भटका हूँ
एक अरसे से इसी उलझन में हूँ,
एक अरसे से इसी उलझन में हूँ,
मैं ....... जुनूं हूँ।
पर ऐ दोस्त
गलती से भी इस बात का
गलती से भी इस बात का
किसी से ज़िक्र न करना
फैसला शहर ने करना है
यहाँ प्यार शर्तों पे किया जाता है
दिल और दिमाग में
कोई फर्क नहीं होता।।
और
ख़ूबसूरती माने ...सिर्फ छोटा कपड़ा ...
यहाँ प्यार शर्तों पे किया जाता है
दिल और दिमाग में
कोई फर्क नहीं होता।।
और
ख़ूबसूरती माने ...सिर्फ छोटा कपड़ा ...
मैं भी यही समझ रहा हूँ
मैं इल्म हूँ।
मैं इल्म हूँ।
No comments:
Post a Comment