Tuesday, 30 July 2013

ऐसा क्या बुखार हुआ है।



कितनी मर्तबा खुद को बेचोगे
माना बिकना रिवाज़ हुआ है
क्या होता था तुम्हारा  रुतबा
क्या से क्या अब हाल हुआ है
रास्ता इतनी बार बदलना
घिरना फिर उठकर न संभालना
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुखार हुआ है। 

बंद आना अब बिआज हुआ है
न गिरवी कोई ज़मीन बची है
न कोई तुम्हे माई बाप कहता है 
न तुमसे कोई फ़रियाद करता है
बाँध पोठ्ली पकड़ो रास्ता
दर बदर अब ज़मींदार हुआ है। 

बिस्तर की रौनक बनता है
आज किसी के कल किसी के
किसी भी हद तक गिर जाता है
दिल ऐसा बाज़ार हुआ है 
 समझने के लायक भी न रहे 
मकान तोड़ा किसी ने, टूटा किसी का। 
जीना तुम्हारा दुश्वार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो,
ऐसा क्या बुखार हुआ है।

बीटा अब जवान हुआ है
देखे हैं उसने मंज़र-तमाम
जब कोई बजुर्ग बिना घरबार हुआ है 
समझोगे अब अच्छे से, बोया है काटेगा कौन
इसबार भी होगा, जो पिछली बार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुख़ार हुआ है। 

वो जब से आशिक हुआ है

वो जब से आशिक हुआ है
सवाल शिकायत नहीं करता
परेशां करने पे परेशां नहीं होता
कहता है किसी से अब नफरत नहीं करता
मोहब्बत के फायदे हैं तो नुक्सान भी होंगे
इतना भरा है, के मोहब्बत की भी बात नहीं करता 

न उसका नाम लेता है, न उसका ज़िक्र करता है
ज़माने से महफूज़ रखता है, पर कैद नहीं करता
जब खुद परिंदा है तो उसे उड़ने से क्यूँ रोके
और कोई डर होता भी है, उसके आगे ज़ाहिर नहीं करता
बहुत जलता है अन्दर ही अन्दर इस बात को लेकर
उसके काबिल नहीं है
यह ज़िक्र भी उसके खातिर नहीं करता
जब से आशिक हुआ है
सवाल शिकायत नहीं करता 

परेशां करने पे परेशां नहीं होता
कहता है किसी से अब नफरत नहीं करता 

जो किताबों में तुझको ढूँढ़ते हैं

ज़िन्दगी तुझमे भी लोग अब ख़ास और ताज़ा ढूँढ़ते हैं
समझदार हैं, अँधेरे में रंग काला ढूँढते हैं

तकलीफ़ को जहन्नुम करार देते हैं
मुसीबतों में पहाड़ ढूँढते हैं

आप ग़लत फ़हमी में जीते हैं
ग़लत अंदाज़े रखते हैं
दीवार में अगर दरार आये, कोट कचहरी करते हैं
यह खंडरों का सौदा करते हैं
कबरों का मुआवजा ढूँढ़ते हैं।

अब किसी की नासमझी पे कोई कितनी बार तंज़ करे 

जिनके आँगन में सूरज रहता है
वोह जुगनुओं को ढूँढ़ते हैं

तू सबके अन्दर रहती है
चारो तरफ तो दिखती है
वोह फिर भी समझ नहीं पाते हैं
जो किताबों में तुझको ढूँढ़ते हैं

ज़िन्दगी तुझमे भी लोग अब ख़ास और ताज़ा ढूँढ़ते हैं
समझदार हैं, अँधेरे में रंग काला ढूँढते हैं

आज उसका चेहरा याद आगया

आज उसका चेहरा याद आगया
जिसने इक रोज़ मेरी कवितायें
यह कह कर लौटा दी थीं 
के तुम्हारे पास शब्दों की कमी है
ख्याल उलझे हुए हैं
आज अपनी बड़ी सी इक तस्वीर
उसके घर के बाहर टांग आया हूँ

जिसपर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा है
आज का अखबार न पढ़ना  !!

कचहरी यहाँ कोई नहीं है

कचहरी यहाँ  कोई नहीं है, सवाल हैं मगर
वकील भी नहीं हैं पर,  दलील है मगर

दुश्मनी नहीं है कोई, इलज़ाम हैं मगर
सजा देना रिवाज़ नहीं, गुनाहगार है मगर 

कटघरे में खड़ा है जो, वही तुम्हारा मुजरिम  है
दोस्त है तो क्या हुआ, कातिल है मगर

जिंदा रखनी है दोस्ती तो
इन्साफ की फरयाद न कर

कचहरी यहाँ कोई नहीं है, बस सवाल हैं मगर !! 
बजुर्ग और तख्ती 

बजुर्ग और तख्ती

                                    


चल दौड़
देख वो पतंग कटने को है 

बहुत देर से लहरा रही थी
बड़ी ही सख्त डोर पे थी शायद
बीच में एक दो तूफां भी आये
पर वो अपनी धुन में  

अपने मालिक की ऊँगली पे नाचती रही
देखना उसे इस बात 
पर इनाम मिलेगा।

चल भाग पुरानी गली के पास
कोई जिंदगी के राज़ बता रहा है
कहते हैं कोई बज़ुर्ग है
झुकी हुई कमर, दिखता भी कम है
इक कागज़ हाथ में पकडे हुए
जिसपर अरबी में जवानी लिखा है  
जो कोई मिलता है, उससे पूछता है,
"इसे कहीं देखा तो नहीं"
कोई पागल बूड़ा समझ कर हस देता है
कोई समझता है
चचा का शरारत करने का मन हो रहा है।
सवाल में छुपे जवाब को समझने वाले
अमीर होकर घर घर लौट रहे हैं
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े खड़े
बस तंज़ करते रह जाते हैं
                                                                 के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

मैंने पास जाकर पुछा क्या माजरा क्या है
बोला थक गया हूँ इसे ढूँढ़ते ढूँढ़ते
हिम्मत भी हार चुका हूँ
पर इच्छा नहीं मरती।

बारिश देखकर भीगने का मन होता है  
पेड़ पे अटकी पतंग देखकर जी करता है के
बस लपक लूं
पर उसका कटा मांझा मेरे पाँव की उँगलियों को छु कर
चला जाता है, और मैं पकड़ नहीं पाता 
यह भी कोई उम्र है यह सब करने की
हर दिन शरीर और मन की
इस लड़ाई से तंग आ गया हूँ
शरीर बूढा हो गया है,
पर आत्मा अभी भी मनचली है। 

अब छोड़ो यह सब क्या है
कितना और चलना है,
अब तो दिखना भी बंद हो गया है  

जूनून, हिम्मत, सपने, मंजिल सब ख्याली चीज़ें होती हैं
मुझे उस फ़क़ीर की बात है
मोहब्बत में शर्तें नहीं होतीं
कुछ नहीं है बस वही है
सब कुछ है तो भी वही है 

दरिया के साथ दुश्मनी और पानी के साथ दोस्ती
इन्सां कितना समझदार हो गया है
पर उसे चालाकी पसंद नहीं 
रास्ता एक ही है, उस तरफ जाने का
उसके बिना जाना, या उसका होकर जाना
फैसला तुम्हारा है, सिला भी तुम्हारा ही होगा   

अब वापस चलें
यहाँ तो पानी का कोई कुआं भी नहीं है
प्यासे मर गए तो
ज़िन्दगी की तरह मौत भी बेमतलब हो जाएगी
पानी पीते हैं, तय्यारी करते हैं, और फिर निकलते है
और अब की बार याद रखना 
उसे ज़िद पसंद नही,दीवाने पसंद हैं
चलो इतनी रौशनी बहुत है। 

सुना है वो बूढ़ा अँधेरा होने पे वो कागज़ जला देता है
राख को हलकी सी फूँक मार के,
एक थकी सी हसी चेहरे पे ओड़कर सो जाता है 
कुछ पल उजाला होता है, और फिर अँधेरा पसर जाता है 
सुबह किसी कटी पतंग के कागज़ पर
अरबी में जवानी लिखकर दिन शुरू करता है
किसी एक के कान में बात डाल  देता है
के उसके पास कुछ  राज़ हैं
किस्मत का पता है।
वो हर दिन यही करता है
जो पता मांगने आते  हैं
उनसे सवाल करता है
समझदार सवाल में  छिपा जवाब देख लेते है
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े रहकर
यही तंज़ करते रह जाते हैं
के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

                                                                                              रमणीक

Monday, 29 July 2013

वहां अब कोई नहीं रहता।



जब जब  तलब उठती है
दौड़ के पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता हूँ
इस सड़क पर पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
वहां अब 
कोई नहीं रहता।

कभी कभी बारिश के मौसम में
एक कारीगर आता है
दीवारों पे निकली सीलन और दरारों को छुपाने
के लिए बाहर बाहर से पुताई करके चला जाता है
 

नजाने कितने साल हो गये, उस घर के दरवाजों को खुले हुए
सोफों पर, कुर्सियों पर, धूल  के पहाड़ जम चुके होंगे
 

मेरा इस घर से कोई वास्ता नहीं है 

एक सावन, तूफां के हाथों
ऊपर वाले कमरे की खिड़की 
टूट गयी थी 
उसका कांच अभी भी  बाहर दरवाज़े के पास रक्खा है
सांस थाम कर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ
दरारों के  बीच खुद को तलाशने की इक और कोशिश करता हूँ 

पर  इससे पहले के खुद को देख लू, पहचान लूं 
चौकीदार अपने डंडे को जोर से ज़मीन पर पटकता है
और
मैं हर बार की तरह ज़हन में
कोई अधूरा जवाब लेकर लौट आता हूँ।

दरअसल उस घर में, सालों से बंद खिड़की दरवाजों के भीतर
उन धूल के पहाड़ों के नीचे
एक छोटी सी कहानी दफन है
बहुत अरसा पहले, इसी मौसम में
इक कमसिन, नादां सी लड़की ने
जो छुट्टियां मनाने आई थी
खेल खेल में
इसी मोहल्ले के एक लड़के से यह पूछ लिया था
के क्या वोह उसका गुड्डा बनेगा। 


लड़का भी उसकी मानिंद मासूम था
थोडा शर्मीला था 

जवाब पकाने में उसे थोडा वक़्त लगा
पर जब तक वोह हिम्मत जुटाता
उस लड़की की छुटियाँ ख़तम हो चुकी थीं 
उसके बाद कई मौसम बीते, साल, महीने, दिन 
उस घर के दरवाजों पे धूल जमती रही, 

लॉन का घास बढ़ता रहा।
उस कारीगर के अलावा उस घर में कोई नहीं आया।

हाँ वो लड़का, जब जब तलब उठती है
बस कांच के टुकड़ों से जवाब मांगने के लिए
दौड़ के उस पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता है
इस सड़क पे पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
जहाँ अब कोई नहीं रहता। 

तुम अभी भी मुस्कुराना नहीं भूले


तुम अभी तक मुस्कुराना नहीं भूले 
अब वो घोंसला नहीं रहा, वो परिंदा नही रहा।

तुम अभी भी हक़ जताना नही भूले
अब वो शाख़ नहीं रही, वो पेड़ नहीं रहा।

अभी तक ख्यालों को हकीकत के कपड़े पहना रक्खे हैं
अब वो रंग नहीं रहे, वो केनवस नहीं रहा।

खुश-मिजाज़ी से तकलीफ का इज़हार ही सियासत है
तुम्हे हमपर यकीं न रहा, हमे तुमपर यकीं न रहा।