Tuesday, 30 July 2013

ऐसा क्या बुखार हुआ है।



कितनी मर्तबा खुद को बेचोगे
माना बिकना रिवाज़ हुआ है
क्या होता था तुम्हारा  रुतबा
क्या से क्या अब हाल हुआ है
रास्ता इतनी बार बदलना
घिरना फिर उठकर न संभालना
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुखार हुआ है। 

बंद आना अब बिआज हुआ है
न गिरवी कोई ज़मीन बची है
न कोई तुम्हे माई बाप कहता है 
न तुमसे कोई फ़रियाद करता है
बाँध पोठ्ली पकड़ो रास्ता
दर बदर अब ज़मींदार हुआ है। 

बिस्तर की रौनक बनता है
आज किसी के कल किसी के
किसी भी हद तक गिर जाता है
दिल ऐसा बाज़ार हुआ है 
 समझने के लायक भी न रहे 
मकान तोड़ा किसी ने, टूटा किसी का। 
जीना तुम्हारा दुश्वार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो,
ऐसा क्या बुखार हुआ है।

बीटा अब जवान हुआ है
देखे हैं उसने मंज़र-तमाम
जब कोई बजुर्ग बिना घरबार हुआ है 
समझोगे अब अच्छे से, बोया है काटेगा कौन
इसबार भी होगा, जो पिछली बार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुख़ार हुआ है। 

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