Tuesday, 30 July 2013

बजुर्ग और तख्ती

                                    


चल दौड़
देख वो पतंग कटने को है 

बहुत देर से लहरा रही थी
बड़ी ही सख्त डोर पे थी शायद
बीच में एक दो तूफां भी आये
पर वो अपनी धुन में  

अपने मालिक की ऊँगली पे नाचती रही
देखना उसे इस बात 
पर इनाम मिलेगा।

चल भाग पुरानी गली के पास
कोई जिंदगी के राज़ बता रहा है
कहते हैं कोई बज़ुर्ग है
झुकी हुई कमर, दिखता भी कम है
इक कागज़ हाथ में पकडे हुए
जिसपर अरबी में जवानी लिखा है  
जो कोई मिलता है, उससे पूछता है,
"इसे कहीं देखा तो नहीं"
कोई पागल बूड़ा समझ कर हस देता है
कोई समझता है
चचा का शरारत करने का मन हो रहा है।
सवाल में छुपे जवाब को समझने वाले
अमीर होकर घर घर लौट रहे हैं
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े खड़े
बस तंज़ करते रह जाते हैं
                                                                 के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

मैंने पास जाकर पुछा क्या माजरा क्या है
बोला थक गया हूँ इसे ढूँढ़ते ढूँढ़ते
हिम्मत भी हार चुका हूँ
पर इच्छा नहीं मरती।

बारिश देखकर भीगने का मन होता है  
पेड़ पे अटकी पतंग देखकर जी करता है के
बस लपक लूं
पर उसका कटा मांझा मेरे पाँव की उँगलियों को छु कर
चला जाता है, और मैं पकड़ नहीं पाता 
यह भी कोई उम्र है यह सब करने की
हर दिन शरीर और मन की
इस लड़ाई से तंग आ गया हूँ
शरीर बूढा हो गया है,
पर आत्मा अभी भी मनचली है। 

अब छोड़ो यह सब क्या है
कितना और चलना है,
अब तो दिखना भी बंद हो गया है  

जूनून, हिम्मत, सपने, मंजिल सब ख्याली चीज़ें होती हैं
मुझे उस फ़क़ीर की बात है
मोहब्बत में शर्तें नहीं होतीं
कुछ नहीं है बस वही है
सब कुछ है तो भी वही है 

दरिया के साथ दुश्मनी और पानी के साथ दोस्ती
इन्सां कितना समझदार हो गया है
पर उसे चालाकी पसंद नहीं 
रास्ता एक ही है, उस तरफ जाने का
उसके बिना जाना, या उसका होकर जाना
फैसला तुम्हारा है, सिला भी तुम्हारा ही होगा   

अब वापस चलें
यहाँ तो पानी का कोई कुआं भी नहीं है
प्यासे मर गए तो
ज़िन्दगी की तरह मौत भी बेमतलब हो जाएगी
पानी पीते हैं, तय्यारी करते हैं, और फिर निकलते है
और अब की बार याद रखना 
उसे ज़िद पसंद नही,दीवाने पसंद हैं
चलो इतनी रौशनी बहुत है। 

सुना है वो बूढ़ा अँधेरा होने पे वो कागज़ जला देता है
राख को हलकी सी फूँक मार के,
एक थकी सी हसी चेहरे पे ओड़कर सो जाता है 
कुछ पल उजाला होता है, और फिर अँधेरा पसर जाता है 
सुबह किसी कटी पतंग के कागज़ पर
अरबी में जवानी लिखकर दिन शुरू करता है
किसी एक के कान में बात डाल  देता है
के उसके पास कुछ  राज़ हैं
किस्मत का पता है।
वो हर दिन यही करता है
जो पता मांगने आते  हैं
उनसे सवाल करता है
समझदार सवाल में  छिपा जवाब देख लेते है
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े रहकर
यही तंज़ करते रह जाते हैं
के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

                                                                                              रमणीक

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