Monday, 29 July 2013

वहां अब कोई नहीं रहता।



जब जब  तलब उठती है
दौड़ के पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता हूँ
इस सड़क पर पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
वहां अब 
कोई नहीं रहता।

कभी कभी बारिश के मौसम में
एक कारीगर आता है
दीवारों पे निकली सीलन और दरारों को छुपाने
के लिए बाहर बाहर से पुताई करके चला जाता है
 

नजाने कितने साल हो गये, उस घर के दरवाजों को खुले हुए
सोफों पर, कुर्सियों पर, धूल  के पहाड़ जम चुके होंगे
 

मेरा इस घर से कोई वास्ता नहीं है 

एक सावन, तूफां के हाथों
ऊपर वाले कमरे की खिड़की 
टूट गयी थी 
उसका कांच अभी भी  बाहर दरवाज़े के पास रक्खा है
सांस थाम कर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ
दरारों के  बीच खुद को तलाशने की इक और कोशिश करता हूँ 

पर  इससे पहले के खुद को देख लू, पहचान लूं 
चौकीदार अपने डंडे को जोर से ज़मीन पर पटकता है
और
मैं हर बार की तरह ज़हन में
कोई अधूरा जवाब लेकर लौट आता हूँ।

दरअसल उस घर में, सालों से बंद खिड़की दरवाजों के भीतर
उन धूल के पहाड़ों के नीचे
एक छोटी सी कहानी दफन है
बहुत अरसा पहले, इसी मौसम में
इक कमसिन, नादां सी लड़की ने
जो छुट्टियां मनाने आई थी
खेल खेल में
इसी मोहल्ले के एक लड़के से यह पूछ लिया था
के क्या वोह उसका गुड्डा बनेगा। 


लड़का भी उसकी मानिंद मासूम था
थोडा शर्मीला था 

जवाब पकाने में उसे थोडा वक़्त लगा
पर जब तक वोह हिम्मत जुटाता
उस लड़की की छुटियाँ ख़तम हो चुकी थीं 
उसके बाद कई मौसम बीते, साल, महीने, दिन 
उस घर के दरवाजों पे धूल जमती रही, 

लॉन का घास बढ़ता रहा।
उस कारीगर के अलावा उस घर में कोई नहीं आया।

हाँ वो लड़का, जब जब तलब उठती है
बस कांच के टुकड़ों से जवाब मांगने के लिए
दौड़ के उस पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता है
इस सड़क पे पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
जहाँ अब कोई नहीं रहता। 

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