जिसके दीदार पे टिकी नज़रों से
ग़ज़लों के चश्मे बहते रहे।
जिसकी पनाह के मुलायम पन्नों पे,
दास्तान ऐ मोहब्बत लिक्खी गयी।
वो लफ़्ज़ों कि गरीबी का आखिर,
क्यूँ यह बहाना करता है।
रौशनी का सौदागर है, फिर भी,
अंधेरों कि शिकायत करता है।
।।रमणीक।।
ग़ज़लों के चश्मे बहते रहे।
जिसकी पनाह के मुलायम पन्नों पे,
दास्तान ऐ मोहब्बत लिक्खी गयी।
वो लफ़्ज़ों कि गरीबी का आखिर,
क्यूँ यह बहाना करता है।
रौशनी का सौदागर है, फिर भी,
अंधेरों कि शिकायत करता है।
।।रमणीक।।
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