सपने देखने और उनके मुक्कमल होने के बीच का रास्ता....सवाल और उनका जवाब मिलने के दरमयां ख़ामोशी के वो दो पल, सच और झूठ के बीच कभी न मिटने वाला फासला.....न होने वाला बहुत कुछ होता है पर किसी कीमत पर....शायद में, मेरे सवाल, मेरा सच और कभी न पूरी हो पाने वाली मेरी वो कविता.......उसी कलम से
Tuesday, 25 March 2014
बिसरा नहीं था, देर हो गयी। किसी गैर की छत थी सर पे, नीचे था समझौते का बिस्तर। बेहोशी में रात कट गई, शर्मिंदगी में सवेर होगयी।
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