रंगों से ही देखता।
रंगों से ही कहता था।
कल देर रात उससे मुलाकात हुई।
किसी ज़माने का नक्काश था,
कागज़ पर नक़्शे खींचता,
ज़िंदा मुर्दा चीज़ों के,
मसौदे तैयार करता था।
अब
नौकरी करता है।
थोडा बहका सा,
शिकायतों से भरा मालूम हुआ
बोला
कभी मैं भी तुम्हारी
कविताओं कि मानिंद,
अपने कैनवास पे
खींचे कच्चे ढांचों से
कहानियां कहता था।
तसवीरें बनाता था।
अचानक रुक गया
आँखें पत्थर
दीवारों पे जमाये
शायद कल के अंधेरों में
गोते खाने उतर गया
नजाने कौनसी तारीख से
एक किस्सा निकाल के ले आया
और सुनाने लगा
बोला
पीले भूरे बाल, उलझे से
बड़ी बड़ी आँखें
एड़ियां उठाये
दीवार से गुब्बारे वाले को झांकती
वो लड़की
पैसे नहीं थे शायद उसके पास
पर आँखों में
गुब्बारे खरीदने का इतना बुखार
इतनी तपिश
के पलकें झपकती तो पलकें पिघल जातीं।
याद है
पर
इक अरसा हो गया है,
अब बड़ी हो गई होगी।
बिना एड़ियां उठाये ही,
वो दुनिया देख लेती होगी,
समझ लेती होगी।
शायद गुब्बारों का शौंक,
मर चुका होगा।
या अब कोई उसके
गुब्बारों से खेलने पे,
ऐतराज़ करता होगा।
पर मेरे पास
ज़िंदा है
अभी भी
हू ब हू, वैसी ही
पीले भूरे उलझे बाल,
मन में तिलमिलाहट बरकरार,
पाँव कि उँगलियों पे खड़ी,
उसी दीवार से झांकती,
ज़िंदा है अभी भी,
मेरे कैनवास में
अब
रंगों से खेलती है
यकीनन गुबारे को उसने
रंगों से भर दिया होगा
बिल्कुल भी नहीं बदली
महफूज़ है मेरे पास
न सड़क पे चलती है
न गाड़ियों पे चढ़ती है
ज़माने कि मैली नज़रों से
मुक्त है वो
न अपनों के बीच है, न बेगानो के
उसका सौदा नहीं होगा
न किसी रिवाज़ कि सूली चढ़ेगी
न किसी स्वामी की ग़ुलामी करेगी
आज़ाद है वोह।
मेरे कैनवास के भीतर,
ज़िंदा है।
खुश है वो, आबाद है वो।
बस यही करता था मैं
तनख्वाह नहीं मिलती थी
पर अमीरी बहुत थी।
लम्हे कैद करना मेरा शौक़ था
और यही अफ़सोस भी
शौक़, शौक़ न होकर जूनून होता
अकेला न मरता।
मलाल है खलता है
कितना अछा होता
आज भी मैं उँगलियों पे
थकावट कि जगह
रंगों के निशाँ लेकर घर लौटता
मलाल है, खलेगा ही
मोहब्बत को
अकेले जो मरने दिया।
रंगों से ही कहता था।
कल देर रात उससे मुलाकात हुई।
किसी ज़माने का नक्काश था,
कागज़ पर नक़्शे खींचता,
ज़िंदा मुर्दा चीज़ों के,
मसौदे तैयार करता था।
अब
नौकरी करता है।
थोडा बहका सा,
शिकायतों से भरा मालूम हुआ
बोला
कभी मैं भी तुम्हारी
कविताओं कि मानिंद,
अपने कैनवास पे
खींचे कच्चे ढांचों से
कहानियां कहता था।
तसवीरें बनाता था।
अचानक रुक गया
आँखें पत्थर
दीवारों पे जमाये
शायद कल के अंधेरों में
गोते खाने उतर गया
नजाने कौनसी तारीख से
एक किस्सा निकाल के ले आया
और सुनाने लगा
बोला
पीले भूरे बाल, उलझे से
बड़ी बड़ी आँखें
एड़ियां उठाये
दीवार से गुब्बारे वाले को झांकती
वो लड़की
पैसे नहीं थे शायद उसके पास
पर आँखों में
गुब्बारे खरीदने का इतना बुखार
इतनी तपिश
के पलकें झपकती तो पलकें पिघल जातीं।
याद है
पर
इक अरसा हो गया है,
अब बड़ी हो गई होगी।
बिना एड़ियां उठाये ही,
वो दुनिया देख लेती होगी,
समझ लेती होगी।
शायद गुब्बारों का शौंक,
मर चुका होगा।
या अब कोई उसके
गुब्बारों से खेलने पे,
ऐतराज़ करता होगा।
पर मेरे पास
ज़िंदा है
अभी भी
हू ब हू, वैसी ही
पीले भूरे उलझे बाल,
मन में तिलमिलाहट बरकरार,
पाँव कि उँगलियों पे खड़ी,
उसी दीवार से झांकती,
ज़िंदा है अभी भी,
मेरे कैनवास में
अब
रंगों से खेलती है
यकीनन गुबारे को उसने
रंगों से भर दिया होगा
बिल्कुल भी नहीं बदली
महफूज़ है मेरे पास
न सड़क पे चलती है
न गाड़ियों पे चढ़ती है
ज़माने कि मैली नज़रों से
मुक्त है वो
न अपनों के बीच है, न बेगानो के
उसका सौदा नहीं होगा
न किसी रिवाज़ कि सूली चढ़ेगी
न किसी स्वामी की ग़ुलामी करेगी
आज़ाद है वोह।
मेरे कैनवास के भीतर,
ज़िंदा है।
खुश है वो, आबाद है वो।
बस यही करता था मैं
तनख्वाह नहीं मिलती थी
पर अमीरी बहुत थी।
लम्हे कैद करना मेरा शौक़ था
और यही अफ़सोस भी
शौक़, शौक़ न होकर जूनून होता
अकेला न मरता।
मलाल है खलता है
कितना अछा होता
आज भी मैं उँगलियों पे
थकावट कि जगह
रंगों के निशाँ लेकर घर लौटता
मलाल है, खलेगा ही
मोहब्बत को
अकेले जो मरने दिया।
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