Tuesday, 25 March 2014

रात शुरू हो गयी है 
और उसके साथ 
नींद का इंतज़ार भी।
उस दरवाज़े के पीछे 
फिर कोई बेमौत मर रहा है 
खौफ से भरी, दबी, 
सिसकियाँ, हिचकियाँ
खिड़की दरवाज़े सब बंद हो
तो भी मुझ तक पहुँच ही जाती हैं।
और अब तो ऐसा आलम है,
के यह न आयें
तो नींद भी नहीं आती।

इसी इंतज़ार में,
इसी कश्मकश के बीच
आँख लगेगी, खुलेगी
फिर लगेगी,फिर खुलेगी
और दुसरे ही पल सवेरा हो जायेगा।
सब कुछ वापस ठीक हो जायेगा।
शायद...
आस है।
यकीन है।
यही दुआ मांगती हूँ उससे।
यही दिलासा देती हूँ खुदको।

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