Tuesday, 25 March 2014

लाशें बहुत सी सजी पड़ीं थी उसके नीचे, 
जिस कफ़न को तुमने शामियाना समझ लिआ। 

उसने नेकियों के बदले मोटी रकम वसूल की, 
तुम देख न पाये और उसे दीवाना समझ लिया। 

वो दस्तक देकर लापता हो गया, 
दो पल कि उस शरारत को तुमने, 
मोहब्बत का इक ज़माना समझ लिया। 

वो भी कोई दीवाना था,
शोहरत के रिवाज़ से खफा,
पर उसकी नज़र अंदाज़ग़ी को सबने,
अमीरी वाला बहाना समझ लिया।

लहजे का बीमार था।
लिहाज़ का अमीर।
रौशनी थोड़ी ज़यादा हो गयी और,
किसी के मंदिर को दूकान कह बैठा,
किसी के खुदा को उसने पुराना समझ लिया।

कोई गया था उसके पास जान हथेली पे लेकर।
उसूलों का मारा,
अदब से निकली मोहब्बत न देख पाया,
उस तोहफे को उसने
अपनी नेकी का मेहनताना समझ लिया।

बन्दूक तुम्हारे मोहल्ले के लौंडे
क्या नहीं चलाना जानते।
तुमसे दोस्ती न हो पायी।
हमसे सच बोला न गया।
पर हमारी मक्कारी की भी कोई हद्द है,
तुमने ज़मीन में दबी टेलीफोन कि तार को भी
खेल पाकिस्ताना समझ लिया।

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