Tuesday, 25 March 2014

तुम देखना 
ये पेड़ फिर हरा हो जायेगा 
पतझड़ हमेशां नहीं रहती।
थोड़ी छिल गयी हूँ, 
ज़ख्म बदन पे नहीं दिखते 
अंदर ही अंदर चुबते हैं। 
पर भर जायेंगे
या भुला दिए जायेंगे।

मैं.....लड़की हूँ...!
किताबों ने अबला कहा,
वैसी ही फिर पहचान बन गयी।
कभी औज़ार बन गयी,
कभी सामान बन गयी।
ब्याह के नाम पे बेचीं गई,
ज़िंदा रही, पर बेजान बन गई।

खोखले समाज की दुहाई देकर,
कितनी बार में रोकी गई।
कितनी मर्तबा टोकी गई।

पड़ोसी कि आँख से बचती रही,
अपनों कि आँख में चुब्ती रही।
ऐसे चलना है
ऐसे दिखना है
दुपट्टे से,
नजाने किसकी आबरू ढकती रही।
खामोश रही फिर भी नोची गई।
.........................................
शाम मज़े में बैठा रहा,
गौरी गिद्दों को दे दी गयी।

।।रमणीक सिंह।। 

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