ज़िन्दगी जब दुआओं पे चलने लगे,
चराग़ जब बीच हवाओं के जलने लगें,
नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
दवा कब की बे-असर हो गई,
हकीम के दाअवे कि असलियत खुल गई,
फरिश्तो को किसी ने तैनाती पर लगा दिया,
सामने आए खुदा,
तो उससे सवाल किया जाये,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
जब तक रौशनी दिखी,
अपने घर जा चुका था।
हमारे बीच कितने अरसे से था
क्या खबर थी, कि वही खुदा था।
हाथ मलते रह गए
माथे पे शिकन लेकर
मस्जिद जाकर, अब,
तोहफे में उसे यह मलाल दिया जाए।
हशर के दिन भी, ऐ दोस्त, फूल बरसेंगे,
सरासर ना-मुमकिन है,
यह क़र्ज़ अदा किया जाए।
बस नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
{ नियामत: आशीर्वाद; हशर: फैसले का दिन }
चराग़ जब बीच हवाओं के जलने लगें,
नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
दवा कब की बे-असर हो गई,
हकीम के दाअवे कि असलियत खुल गई,
फरिश्तो को किसी ने तैनाती पर लगा दिया,
सामने आए खुदा,
तो उससे सवाल किया जाये,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
जब तक रौशनी दिखी,
अपने घर जा चुका था।
हमारे बीच कितने अरसे से था
क्या खबर थी, कि वही खुदा था।
हाथ मलते रह गए
माथे पे शिकन लेकर
मस्जिद जाकर, अब,
तोहफे में उसे यह मलाल दिया जाए।
हशर के दिन भी, ऐ दोस्त, फूल बरसेंगे,
सरासर ना-मुमकिन है,
यह क़र्ज़ अदा किया जाए।
बस नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।
{ नियामत: आशीर्वाद; हशर: फैसले का दिन }
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