Wednesday, 25 June 2014

malaal aur sukoon

यह ऊँट  अभी बूढ़ा नहीं हुआ।
इन झुर्रियों पे मत जाओ,
ढीली  चाल पे मत जाओ,
झुके कंधों पे मत जाओ,
इक बड़ा अरसा इन्होने
ज़िम्मेदारीआं उठाये रखीं हैं
थक गए हैं।

ईमानदारी ने ना पैसा दिया
न शोहरत, न बड़ा घर।
पर सकून भी किसी चीज़ का नाम होता है।
अपनी ईमानदारी और कुर्बानियों पे नाज़ से है जो
आँखों  में देखना
शायद थोड़ी सी वो चमक दिखा जाये।

बालों की इस सफेदी पर भी न जाना
ये उम्र के हिसाब से नहीं
ख्यालों की गहराई से रंग बदलते हैं

कुछ किस्से ज़हन से कभी जुदा नहीं होते।
हर महीने अपनी लाटरी के नतीजे निकलने का
वो बेसब्री से इंतज़ार
सब बच्चे पीछे तैयार रहते थे
शाम को घर में मारुती कार आएगी
पर कुछ ख्वाहिशें कितनी भी सच्ची हों
शौंक जितने भी बड़े हों
 सपने अखबार के इश्तेहारों में नहीं बिका करते
और चूँकि सपने खरीदकर नहीं देखे जाते
इसलिए उनके पूरे न होने पर
अफ़सोस नहीं किया जाता
पर ऐसा ही है शायद

अब बस झुके हुए कंधे ही हैं
 सब कहाँनी कहने को
अब न ज़िम्मेदारियाँ रही न बाप

बस नज़रें मिलाकर उनका कहना
किसी चीज़ की कमी न होगी
बस
तब से एक सकूँ सा है
जैसे किसी फ़रिश्ते ने
पर्ची पे लिख कर
कोई वादा दे दिया हो
पर शिकायत यही है

ज़म्मेदारियां ख़त्म होती हैं
आदमी कब्र के बहुत करीब आ जाता है
पर कुछ मलाल कभी नहीं मरते
माँ को भी कोई शिकायत नहीं थी
एक दफा बीमार हुई थी
इलाज के लिए पैसों पे कोई चर्चा हो
उससे पहले ही उसकी बहु ने अपने ज़ेवर
सुनार को बिजवा दिए
उसे भी कोई शिकायत न थी
जाते वक़्त उसके मुँह से भी बस दुआ ही निकली
बहुत याद आती है
कंधे झुक चुके हैं
फिर भी लगता है कुछ और उठाना बाकी था
कभी कभी बहुत कस के रोना आता है
सोचता हूँ
ज़िंदा होती तोह पाँव पकड़ के माफ़ी मांग लेता
हर रोज़ ऐसे ही किसी ख्याल से दिन शुरू होता है
कि वो होती तो ऐसा


Tuesday, 25 March 2014

उसकी फितरत सिर्फ इम्तिहान लेना है 
सवालों के जवाब देना वोह नहीं जानता। 
ऐसा भी नहीं के उसे जवाब नहीं आते 
बस इंसानों के आगे झुकना नहीं जनता। 

देख आज तेरी फितरत पे भी 
तंज़ कस ही दिया,
तुही कहता था ना 
इंसान मेरा गुलाम है 
बग़ावत करना नहीं जानता। 

:रमणीक
चलो शुरू की जाए दिहाड़ी 
उसके घर के बाहर खड़े हो जाओ , 
उसके पीछे पीछे जाओ 
हर बात सुनो, नज़रों पे नज़र रखो
जैसे ही कुछ ग़लत बोले
सज़ा सुनाकर चले आना 
वो इंसान है 
पर वो गलती नहीं कर सकता। 

अगर उसपर इलज़ाम न लगा, 
तुम्हारी तनख्वाह काट ली जाएगी
सब अगर सफ़ेद ही देखेंगे
उस काले निशाँ का क्या होगा
जाओ उसे थोड़ा और बड़ा कर दो
खामियां देखना ज़रूरी है
खूबियाँ देखना वक़्त बर्बाद करना है
दोस्ती की तन्ख्वय नहीं मिलती।

धार तेज़ रखना
अभी कोई गलती करता ही होगा
ज़बान भी फिसले
गर्दन काट डालना।

और इनका लिहाज़ बिलकुल न करना।
इनकी बात दुनिया मानती है
इतने मुक़दमे डालना
की दुबारा दुनिया के सामने ही न आ पाएं
या कम से कम दुनिया का
इनसे ऐतबार उठ जाए
हमें जगाना है, अवाम सो रहा है
पर सच नहीं, अपना चेहरा दिखाना है

लगे रहो
वो सांस भी आधी पूरी लें
उनपर कार्यवाही चला देना
इंसान है
पर गलती नहीं कर सकते।

शाबाश,
बस इसी तरह,
बहुत खूब!!
तुम्हारी तरक्की होगई है
आज से तुम्हारा ओहदा है
ठेकेदार।
और नाम होगा 'बाप'।
रात शुरू हो गयी है 
और उसके साथ 
नींद का इंतज़ार भी।
उस दरवाज़े के पीछे 
फिर कोई बेमौत मर रहा है 
खौफ से भरी, दबी, 
सिसकियाँ, हिचकियाँ
खिड़की दरवाज़े सब बंद हो
तो भी मुझ तक पहुँच ही जाती हैं।
और अब तो ऐसा आलम है,
के यह न आयें
तो नींद भी नहीं आती।

इसी इंतज़ार में,
इसी कश्मकश के बीच
आँख लगेगी, खुलेगी
फिर लगेगी,फिर खुलेगी
और दुसरे ही पल सवेरा हो जायेगा।
सब कुछ वापस ठीक हो जायेगा।
शायद...
आस है।
यकीन है।
यही दुआ मांगती हूँ उससे।
यही दिलासा देती हूँ खुदको।
तुम देखना 
ये पेड़ फिर हरा हो जायेगा 
पतझड़ हमेशां नहीं रहती।
थोड़ी छिल गयी हूँ, 
ज़ख्म बदन पे नहीं दिखते 
अंदर ही अंदर चुबते हैं। 
पर भर जायेंगे
या भुला दिए जायेंगे।

मैं.....लड़की हूँ...!
किताबों ने अबला कहा,
वैसी ही फिर पहचान बन गयी।
कभी औज़ार बन गयी,
कभी सामान बन गयी।
ब्याह के नाम पे बेचीं गई,
ज़िंदा रही, पर बेजान बन गई।

खोखले समाज की दुहाई देकर,
कितनी बार में रोकी गई।
कितनी मर्तबा टोकी गई।

पड़ोसी कि आँख से बचती रही,
अपनों कि आँख में चुब्ती रही।
ऐसे चलना है
ऐसे दिखना है
दुपट्टे से,
नजाने किसकी आबरू ढकती रही।
खामोश रही फिर भी नोची गई।
.........................................
शाम मज़े में बैठा रहा,
गौरी गिद्दों को दे दी गयी।

।।रमणीक सिंह।। 
इस खेल को समझने में
थोड़ी देरी हो गई,
मौत से बचना 
मौत से भयानक 
सज़ा हो गई,
ऐसी चाल फ़कीर चल गया 
ज़िन्दगी 
ज़िन्दगी में ही क़ैद होगयी।
बिसरा नहीं था, 
देर हो गयी। 
किसी गैर की 
छत थी सर पे,
नीचे था 
समझौते का बिस्तर।
बेहोशी में 
रात कट गई, 
शर्मिंदगी में 
सवेर होगयी।
मसरूफियत का यह खेल, Masroofiyat ka yeh khel,
हमसे न खेलना दोस्त, humse na khelna dost,
नज़र में बसाकर, nazar mein basakar,
नज़रअंदाज़ करने का हुनर nazrandaaz karne ka hunar, 
हम में भी बहुत है। hum me bhi bahut hai..!! 

:रमणीक
ज़िन्दगी जब दुआओं पे चलने लगे, 
चराग़ जब बीच हवाओं के जलने लगें,
नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,
इस बार दरगाह पे नहीं, 
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।

दवा कब की बे-असर हो गई,
हकीम के दाअवे कि असलियत खुल गई,
फरिश्तो को किसी ने तैनाती पर लगा दिया,
सामने आए खुदा,
तो उससे सवाल किया जाये,
इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।

जब तक रौशनी दिखी,
अपने घर जा चुका था।
हमारे बीच कितने अरसे से था
क्या खबर थी, कि वही खुदा था।

हाथ मलते रह गए
माथे पे शिकन लेकर
मस्जिद जाकर, अब,
तोहफे में उसे यह मलाल दिया जाए।

हशर के दिन भी, ऐ दोस्त, फूल बरसेंगे,
सरासर ना-मुमकिन है,
यह क़र्ज़ अदा किया जाए।
बस नियामतों का शुक्र अदा किया जाए,

इस बार दरगाह पे नहीं,
माँ के पैरों पे सजदा किया जाए।

{ नियामत: आशीर्वाद; हशर: फैसले का दिन }
रंगों से ही देखता। 
रंगों से ही कहता था। 
कल देर रात उससे मुलाकात हुई। 
किसी ज़माने का नक्काश था, 
कागज़ पर नक़्शे खींचता, 
ज़िंदा मुर्दा चीज़ों के, 
मसौदे तैयार करता था।

अब
नौकरी करता है।

थोडा बहका सा,
शिकायतों से भरा मालूम हुआ
बोला
कभी मैं भी तुम्हारी
कविताओं कि मानिंद,
अपने कैनवास पे
खींचे कच्चे ढांचों से
कहानियां कहता था।
तसवीरें बनाता था।

अचानक रुक गया
आँखें पत्थर
दीवारों पे जमाये
शायद कल के अंधेरों में
गोते खाने उतर गया
नजाने कौनसी तारीख से
एक किस्सा निकाल के ले आया
और सुनाने लगा
बोला
पीले भूरे बाल, उलझे से
बड़ी बड़ी आँखें
एड़ियां उठाये
दीवार से गुब्बारे वाले को झांकती
वो लड़की
पैसे नहीं थे शायद उसके पास
पर आँखों में
गुब्बारे खरीदने का इतना बुखार
इतनी तपिश
के पलकें झपकती तो पलकें पिघल जातीं।
याद है
पर
इक अरसा हो गया है,
अब बड़ी हो गई होगी।
बिना एड़ियां उठाये ही,
वो दुनिया देख लेती होगी,
समझ लेती होगी।
शायद गुब्बारों का शौंक,
मर चुका होगा।
या अब कोई उसके
गुब्बारों से खेलने पे,
ऐतराज़ करता होगा।

पर मेरे पास
ज़िंदा है
अभी भी
हू ब हू, वैसी ही
पीले भूरे उलझे बाल,
मन में तिलमिलाहट बरकरार,
पाँव कि उँगलियों पे खड़ी,
उसी दीवार से झांकती,
ज़िंदा है अभी भी,
मेरे कैनवास में
अब
रंगों से खेलती है
यकीनन गुबारे को उसने
रंगों से भर दिया होगा

बिल्कुल भी नहीं बदली
महफूज़ है मेरे पास
न सड़क पे चलती है
न गाड़ियों पे चढ़ती है
ज़माने कि मैली नज़रों से
मुक्त है वो

न अपनों के बीच है, न बेगानो के
उसका सौदा नहीं होगा
न किसी रिवाज़ कि सूली चढ़ेगी
न किसी स्वामी की ग़ुलामी करेगी

आज़ाद है वोह।
मेरे कैनवास के भीतर,
ज़िंदा है।
खुश है वो, आबाद है वो।


बस यही करता था मैं
तनख्वाह नहीं मिलती थी
पर अमीरी बहुत थी।

लम्हे कैद करना मेरा शौक़ था
और यही अफ़सोस भी
शौक़, शौक़ न होकर जूनून होता
अकेला न मरता।
मलाल है खलता है
कितना अछा होता
आज भी मैं उँगलियों पे
थकावट कि जगह
रंगों के निशाँ लेकर घर लौटता

मलाल है, खलेगा ही
मोहब्बत को
अकेले जो मरने दिया।
लाशें बहुत सी सजी पड़ीं थी उसके नीचे, 
जिस कफ़न को तुमने शामियाना समझ लिआ। 

उसने नेकियों के बदले मोटी रकम वसूल की, 
तुम देख न पाये और उसे दीवाना समझ लिया। 

वो दस्तक देकर लापता हो गया, 
दो पल कि उस शरारत को तुमने, 
मोहब्बत का इक ज़माना समझ लिया। 

वो भी कोई दीवाना था,
शोहरत के रिवाज़ से खफा,
पर उसकी नज़र अंदाज़ग़ी को सबने,
अमीरी वाला बहाना समझ लिया।

लहजे का बीमार था।
लिहाज़ का अमीर।
रौशनी थोड़ी ज़यादा हो गयी और,
किसी के मंदिर को दूकान कह बैठा,
किसी के खुदा को उसने पुराना समझ लिया।

कोई गया था उसके पास जान हथेली पे लेकर।
उसूलों का मारा,
अदब से निकली मोहब्बत न देख पाया,
उस तोहफे को उसने
अपनी नेकी का मेहनताना समझ लिया।

बन्दूक तुम्हारे मोहल्ले के लौंडे
क्या नहीं चलाना जानते।
तुमसे दोस्ती न हो पायी।
हमसे सच बोला न गया।
पर हमारी मक्कारी की भी कोई हद्द है,
तुमने ज़मीन में दबी टेलीफोन कि तार को भी
खेल पाकिस्ताना समझ लिया।
खुमारी बहुत देर पैसे की अच्छी नहीं साहिल 
मुकद्दर मिजाज़ बदलने में देर नहीं करता 

नियामतों का दौर अभी बाकी है, 
नशे से बाहर आजाओ....
वो शहंशाह को कलंदर करने में देर नहीं करता 

अमीरी तेवर दिखाती है 
इख़लाक़ भूल जाती है। 
शोहरत लुटाने वाला ज़माना 
बे-हिचक बे आबरू करने में देर नहीं करता। 
लाशें बहुत सी सजी पड़ीं थी उसके नीचे, 
जिस कफ़न को तुमने शामियाना समझ लिआ। 

उसने नेकियों के बदले मोटी रकम वसूल की, 
तुम देख न पाये और उसे दीवाना समझ लिया। 

वो दस्तक देकर लापता हो गया, 
दो पल कि उस शरारत को तुमने, 
मोहब्बत का इक ज़माना समझ लिया। 

वो भी कोई दीवाना था,
शोहरत के रिवाज़ से खफा,
पर उसकी नज़र अंदाज़ग़ी को सबने,
अमीरी वाला बहाना समझ लिया।

लहजे का बीमार था।
लिहाज़ का अमीर।
रौशनी थोड़ी ज़यादा हो गयी और,
किसी के मंदिर को दूकान कह बैठा,
किसी के खुदा को उसने पुराना समझ लिया।

कोई गया था उसके पास जान हथेली पे लेकर।
उसूलों का मारा,
अदब से निकली मोहब्बत न देख पाया,
उस तोहफे को उसने
अपनी नेकी का मेहनताना समझ लिया।

बन्दूक तुम्हारे मोहल्ले के लौंडे
क्या नहीं चलाना जानते।
तुमसे दोस्ती न हो पायी।
हमसे सच बोला न गया।
पर हमारी मक्कारी की भी कोई हद्द है,
तुमने ज़मीन में दबी टेलीफोन कि तार को भी
खेल पाकिस्ताना समझ लिया।
जिसके दीदार पे टिकी नज़रों से 
ग़ज़लों के चश्मे बहते रहे। 
जिसकी पनाह के मुलायम पन्नों पे, 
दास्तान ऐ मोहब्बत लिक्खी गयी। 
वो लफ़्ज़ों कि गरीबी का आखिर, 
क्यूँ यह बहाना करता है।
रौशनी का सौदागर है, फिर भी,
अंधेरों कि शिकायत करता है। 

।।रमणीक।।
ज़िन्दगी…… 
पलट कर पीछे भी तो नहीं देखती 
घूम कर अगले चोराहे से 
वापस भी तो नहीं आती। 

फैसले ले लेती है... सफाई नहीं देती 
सवाल नहीं पूछती 
जवाब नहीं मांगती 
नज़रें मिलाकर कुछ छीनती नहीं है 
नज़रें झुका कर 
माफ़ी नहीं मांगती।

मुआफियां दुहराने से
ज़ख्म भी तो नहीं भरते
घड़ी कि सुइयां जब
चुनौती दे रही हों
हाथों से रेत का फिसलना जारी हो
नफरतों को काबू में किया जाए
बुनियाद ख़त्म हो जाने के बाद
इमारतें बचा भी तो नहीं करती।

बड़ी अकड़ है इसमें
ज़िन्दगी न हुई .... 'ज़िन्दगी' होगयी
दौड़ती जाती है,
पलट कर पीछे भी तो नहीं देखती
ज़िन्दग....…।
Chalo aaj bazaar nikaltey hain...
lafzon ki kuch kharidari ki jaaye...!

Nazmo'n ke kache mehal mein jaale lag gaye hain 
Naye rang-e-ehsason se inpe safedi ki jaye...!

Sookhte kisi ped ne aisa aaina dikhaaya hai aaj
chalo aaj neeyat se dhool hata hi lee jaaye..!

Ek naye shehar ka jo tumne khwaab dikhaaya hai
kyun na gaanv waalon se bhi uspe raye lee jaaye...!

kaafile mein chalenge sab, saathiyon ki maanind..
Is musafiron ke daste mein, khudaa,
humari bhi bharti ki jaaye..!!