Wednesday, 16 October 2013

बड़ी पुरानी हसरत थी

हसरत मरती नहीं है
जब तक जिंदा रहती है 
उलझा के रखती है 

कल के अँधेरे में 
खोया गीत 
कल के सन्नाटे में 
खोयी ग़ज़ल
दिए जलाने पर, 
ढोल पीटने पर, 
ख़ामोशी की जंजीरों को
न तोड़ पाते हैं,
न उनसे निकल पाते हैं।

कुछ शक्लें पर जिंदा रह जाती हैं.
जो कल से चल कर आज तक
पहुँचती हैं,
पर शक्सियत का बोझ नहीं उठा पाती
वफ़ा की दौड़ लम्बी होती है
हर कोई नहीं दौड़ पाता।

तुम्हारा मुझसे कहना
के तुम्हे आज भी मुझसे मोहब्बत है
तुम्हारे ही
लिए तुमसे दूर हुई थी
कितना सच है कितना फरेब।
चलो मान लिया, मुआफ़ भी किया
लो, उठाओ, लेजाओ इस लाश को
दफनाई हुई मोहब्बत
कब्रों से निकाली नहीं जाती।

पर तुम्हारी आज की
इस मुलाकात का
क़र्ज़ है मुझपर
बड़ी पुरानी हसरत थी
तुम्हे जी भर के देखने की
तुम्हारी, अब ठहर चुकी, नज़रों को
ज़हन में भरने की...

बस यही वजह थी इस खेल की
बड़ी पुरानी हसरत थी
और हसरत मरती नहीं
जब तक ज़िंदा रहती है
उलझा के रखती है।

: रमणीक सिंह

पैसा समझता, तो सब कुछ होता!!!

शब्दों से जीत न सके 
रंग पे आगये, 
पैसे की फितरत होती है 
गरीबी से दोस्ती नहीं करता 
मज़ाक करता है 
सौदा करता है। 
अच्छा हुआ, 
तुम अपने असल पे उतर आये 
मुफलिसी की फितरत है ऐतबार करना 
खरीदने की बात नहीं करती 
दोस्ती करना जानती है,
खुश रहती है
मुफलिसी चालाक हो जाती है
खज़ाने की हिफाज़त का
वक़्त आजाता है
अशर्फियाँ खायी नहीं जाती
पैसा समझता
तो सब कुछ होता!!!

मुफलिसी : poverty
अशर्फियाँ : Currency/money

Thursday, 3 October 2013

पर वोह गवाही नहीं देगा।

तुम जो मेरे साथ
इतने दिनों से इस सफ़र पे हो
तुम ही बताओ
क्या में भी किसी रंजिश का हिस्सा हूँ
किसी इंतेकाम के रास्ते पे हूँ
या किसी मकाम की जिद्द पे।
तुम्हे तो इल्म होगा ही
मुझे भूलने की आदत है
इसी के चलते इक मर्तबा
कहीं से बहुत से पैसे लेकर आया था
पर
ज़मीर खोकर अमीर होने का ख्याल
मेरा नहीं हो सकता
तुमने बेशक मुझे मजबूर किया होगा
पर मेरी साँसों के रुकने से
तेरी मौत तो न होगी
यह तोह वही जानता है
जो तुझमे भी है
और मुझमे भी
पर वो बोलेगा नहीं
मुझे आज भी याद है
रज्जो का कहना सही था
आबरू से ऊपर कुछ नहीं होता है
हमारी मोहब्बत को फना होना ही होगा
कीमत यही है अदा करनी ही होगी
हम भगावत नहीं करेंगे
बल्लू ने आखिरी बार उसे गले लगाया
और कभी उस तरफ नहीं देखा
कहानी कोई नहीं जानता आगे की
एक हो तो कोई खबर रखता
नजाने कितने बल्लू
कितनी रज्जो
ख़ामोश, दिल में कोई वास्ता दबाये हुए
सूली चढ़ गए
ज़रा गौर से देखो इसपर मोटे मोटे अक्षरों मेंन
अभिमान और मर्यादा लिखा हुआ है
हाँ दरोगा साहब
यही है वो सूली जिसपर टांग दिए गए
दो लोग जिन्हें वहम हो गया था
के वो आज़ाद हैं।

सब देखा है उसने
जो इनके जनाज़े में भी शामिल था
और कातिलों की महफ़िल में भी
पर वोह गवाही नहीं देगा।  

पर वो कुछ बोलेगा नहीं

कितना ज़रूरी था मेरी आबादी को
उसकी मौत का सबब बनना।
कभी कभी इत्तेफाक
साज़िश का शिकार हो जाया करते हैं।
यह बात वोह अच्छे से जानता है
जो इनके जनाज़े में भी शामिल था
और उनकी महफ़िल में भी।
कभी कभी काजी भी
राह-ऐ-काबा भूल जाया करते हैं।

कितना लाज़िम है इनकार करना,
उस मुजरिम का ऐतबार करने से
यहाँ कौन मुजरिम नहीं है।
और उसका जुर्म यह नहीं
के वोह कातिल है
उसका गुनाह यह है के
वोह कैदी हो गया है
तुम्ही हो जो यकीन कर सकते हो
पर नजाने कैसे इमाम हो
दोज़क की धमकियां देते हो
जन्नत का रास्ता नहीं
दिखाते
याद रखना कैदी तुम भी हो
इस नहीं तोह उस अदालत के, यकीनन हो।

और वहाँ न सरकारी वकील मिलेंगे
न दूकान वाले।
तुम्हे गवाही नहीं देनी है ..
सिर्फ उसकी दलील सुननी है
माकूल हो या ना-माकूल।
किसी को मौत दी जा रही है।
उसे इतना तो कहने का मौका दीजिये,
मैं अपने जुर्म का इकबाल करता हूँ।

कितना ज़रूरी है
उसकी गर्दन का कलम होना
क़त्ल का बदला क़त्ल, इन्साफ नहीं है
और मुजरिम को ख़त्म करना
जुर्म है, सज़ा नहीं है।  

वोह सब जानता है
वही ....
जिसने क़त्ल किया है।
गवाह भी है
और अब फैसला सुना रहा है।
पर वो कुछ बोलेगा नहीं।

आखिरी फरेब

आखिरी फरेब है
तझे पा लिया,
या खो दिया।
सुबह आँख खुलेगी
मालूम हो जायेगा
मेरी मजबूरी है
और तेरा यकीन अभी कचा है।
इक आखिरी झूठ का
सहारा लेना बाकी है
सुबह आँख खुलेगी
सच सामने आ जायेगा।

मंज़ूर अभी से ही है मुझे फांसी की सज़ा।
कौन देखेगा कल सुबह तक
तेरा क्या है फैसला।

आखिरी फरेब है तुझे करीब लाने के लिए,
जताने का बस यही तरीका है।
तुझे हासिल करना मेरा मकसद नहीं।
उम्मीद तुझसे कोई नहीं है,
मेरे ख़त तो तूने पढ़े नहीं,
अश्क तोह तुझे दिखे नहीं,
मेरी इबादत का क्या ख़ाक समझेगा।

वैसे भी तुझे यह सब फरेब ही लगता है।
और तुझे जब यह सब फरेब ही लगता है,
इक आखिरी फरेब और सही।
सुबह आँख खुलेगी,
मालूम हो जाएगा। 

दरया मुझसे रूठ गया है

एक समंदर पास खड़ा है
एक समंदर दूर खड़ा है
पर दरया मुझसे रूठ गया है
जब से गए हैं बाँध बना के
सरकार ......
या उसके ठेकेदार बना के
मकान बाकी बचे हैं सारे
मोहल्ला हमारा टूट गया है

समंदर की चौकीदारी का
जबसे मैंने ठेका लिया है
गाँव मुझसे नफरत करता है
सब कुछ मेरा  छूट गया है
पैसा कमाना मजबूरी था
इस मौसम
दाना कचा ही टूट गया है

निगरानी आँखों से करता हूँ
अब दिल मेरा भी टूट गया है
 बाड़ आएगी हम डूबेंगे
और डूबेगी अपनी झुग्गी
मुआवजा ..........
नजाने किसको मिलेगा
भारत का निर्माण होगा
तुमने हमसे झूट कहा है

समंदर की निगरानी के
खेल से जब से पर्दा उठा है
साहिल से होकर शर्मिंदा
समंदर खुद में डूब गया है

हमारे भले की बात न करना
मना लिया है रूठे जंगल को
पर तुमसे तुम्हारा ........
आखिरी मौका छूट गया है।

Thursday, 19 September 2013

अब मेरे घर में जुगनू नहीं आते

अब मेरे घर में
जुगनू नहीं आते
कुछ रोज़ पहले
मोहल्ले में
बड़े बड़े बिजली के
खंभे लगाये गए थे
इक लाल पीली तार
से लटका हुआ
कांच का इक गेंद
हमारी छत से नीचे
लटका दिया गया
रात होती है,
ज़ोर ज़ोर से जलने लगता है
बहुत रौशनी करता है
पर उसके अन्दर की आग
बाहर नहीं आती।

कमरे मैं रक्खी तमाम चीज़ें
दिखने लगती हैं
दादी का चरखा,
माँ का चूल्हा,
बाबा का फावड़ा
दादी का चरखा
चावल का टीपा
सब दिखता है
बस वो जुगनू दिखाई नहीं देते।
लगता है साथ वाले
गाँव में चले गए
कोई कह रहा था,
नक्सिलयों का गाँव है
वहां बिजली के
खम्बे नहीं लगेंगे।

मुझे भी वहीँ जाना है
वैसे भी ऐसी रौशनी से
कमरे का अँधेरा मिटता है
तकदीर नहीं
मुझे मालूम है
के मुझे भी
नक्सली कहा जायेगा
पर ज़मींदार और सरकार
क्या सोचते हैं
इससे मुझे कोई गरज नहीं
मुझे बस इस घर में नहीं रहना
यह घर अब मुझे
अच्छा नहीं लगता
.......................
इस घर में अब जुगनू नहीं आते।    

Monday, 26 August 2013

तुम्हारे ही कागज़ पे लिखे

तुम्हारी ही कलम है यह,
तुम्हारे ही कागज़ पर लिखे,
अलफ़ाज़ तुम्ही से उधार लिए हैं।
इस नज़्म में बस ख्याल मेरे हैं,
पर वोह भी मेरी उपज नहीं हैं,
वजूद भी इनका तुम्ही से है।

फिर मेरा तोह कुछ रहा नहीं,
और मैं भी मैं अब रहा नहीं।
के मेरा तुझमे खो जाना,
मेरा ही पूरा होना है।

मेरे बदन से तेरे बदन तक,
मेरे ज़हन से तेरे ज़हन तक,
क्या सफ़र था क्या नज़ारा।
..................................
सवाल, शिकायतें, इलज़ाम, रंजिशें,
एक होने की राहत में,
दिल ने सब खारिज करदीं।

एक नज़र से दुनिया देखी
उसी नज़र से खुद को देखा।
कितना अच्छा मंज़र है यह
कितना पाकीज़ा ख्याल है यह।
........................................
पर ख्याल भी तोह मेरा नहीं हैं
और कलम भी नहीं है मेरी।
तुम्हारे ही कागज़ पे लिखे
लफ्ज़ तुम्ही से उधार लिए हैं।
...................................
प्यार करने का वक़्त हुआ है
चलो लिखना अब बंद करते हैं।

Saturday, 3 August 2013

farishta aaj bhi mujhse jalta hai


farishta aaj bhi mujse woh jalta hai....


mujhko jannat le jaane aaya tha....


maine tumhara zikr kiya...


ulte paanv palat gaya...


jaate jaate bol gaya...


tumne saari khudaai dil mein basai hai.....

jis rooh ke aashiq ban baithe ho...


usne tumse pehle jannat thukraai hai...


woh insaa nahi farishta hai, ..


kyun insaano ki duniya mein basta hai....


tumhe bhi apne jaisa bana diya


uske jaise dikhne lage ho


lagta hai tumhe bi farishta bana diya


................................................


ab kya karu, kya unse kahu


naukri meri chali jaayegi


tum toh saath nahi chaloge


aur woh dil se tumhare nahi jayegi


...............................


acha ab main chalta hoon


unhe samjhaane ki koshish karta hoon


phr chala gaya bechara woh


sarkaari paigaam lekar aayatha


::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::


farishta aaj bhi mujse woh jalta hai....


mujhko jannat le jaane aaya tha....


Friday, 2 August 2013


Thoda dhool uchaal, aankh mein matti daal,
nazron se nazrein mila
ped nahi pauda hu, par hila ke dikha

tere liye jo dhandha hai, woh meri ibaadat hai
tu woh kar jo teri havas hai
aur main wo jo mera hunar hai
deewarein beshak kamzor hain iski
ibaadatgaah tu par yeh hila ke dikha

shehar mein aaye chhe mahine hue hain “
par shehri banne mein che din lagte hain
aur itna khel toh main bhi samajhta hoon
himmat ki koi kammi nahi hai
par murdo se ladna bhi koi himmat nahi hai

Main beshak tera gulaam hota
mera mukkadar jo tere haath mein hota
tere dikhaye raaste pe chalna
bhatakna se behtar to nahi
kyun na main fir apne dil ki suno
Ke agar kamyaab na bhi banu,
toh khud se nazrein toh mila sakuu’n

isliye yeh khilafatnaama likh raha hoon mein”
tujhe khabar nahi shaayad
kuch dino se bagaavat ki tayyari mein hoon mein

Tuesday, 30 July 2013

ऐसा क्या बुखार हुआ है।



कितनी मर्तबा खुद को बेचोगे
माना बिकना रिवाज़ हुआ है
क्या होता था तुम्हारा  रुतबा
क्या से क्या अब हाल हुआ है
रास्ता इतनी बार बदलना
घिरना फिर उठकर न संभालना
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुखार हुआ है। 

बंद आना अब बिआज हुआ है
न गिरवी कोई ज़मीन बची है
न कोई तुम्हे माई बाप कहता है 
न तुमसे कोई फ़रियाद करता है
बाँध पोठ्ली पकड़ो रास्ता
दर बदर अब ज़मींदार हुआ है। 

बिस्तर की रौनक बनता है
आज किसी के कल किसी के
किसी भी हद तक गिर जाता है
दिल ऐसा बाज़ार हुआ है 
 समझने के लायक भी न रहे 
मकान तोड़ा किसी ने, टूटा किसी का। 
जीना तुम्हारा दुश्वार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो,
ऐसा क्या बुखार हुआ है।

बीटा अब जवान हुआ है
देखे हैं उसने मंज़र-तमाम
जब कोई बजुर्ग बिना घरबार हुआ है 
समझोगे अब अच्छे से, बोया है काटेगा कौन
इसबार भी होगा, जो पिछली बार हुआ है
सुना है बहुत बीमार रहते हो
ऐसा क्या बुख़ार हुआ है। 

वो जब से आशिक हुआ है

वो जब से आशिक हुआ है
सवाल शिकायत नहीं करता
परेशां करने पे परेशां नहीं होता
कहता है किसी से अब नफरत नहीं करता
मोहब्बत के फायदे हैं तो नुक्सान भी होंगे
इतना भरा है, के मोहब्बत की भी बात नहीं करता 

न उसका नाम लेता है, न उसका ज़िक्र करता है
ज़माने से महफूज़ रखता है, पर कैद नहीं करता
जब खुद परिंदा है तो उसे उड़ने से क्यूँ रोके
और कोई डर होता भी है, उसके आगे ज़ाहिर नहीं करता
बहुत जलता है अन्दर ही अन्दर इस बात को लेकर
उसके काबिल नहीं है
यह ज़िक्र भी उसके खातिर नहीं करता
जब से आशिक हुआ है
सवाल शिकायत नहीं करता 

परेशां करने पे परेशां नहीं होता
कहता है किसी से अब नफरत नहीं करता 

जो किताबों में तुझको ढूँढ़ते हैं

ज़िन्दगी तुझमे भी लोग अब ख़ास और ताज़ा ढूँढ़ते हैं
समझदार हैं, अँधेरे में रंग काला ढूँढते हैं

तकलीफ़ को जहन्नुम करार देते हैं
मुसीबतों में पहाड़ ढूँढते हैं

आप ग़लत फ़हमी में जीते हैं
ग़लत अंदाज़े रखते हैं
दीवार में अगर दरार आये, कोट कचहरी करते हैं
यह खंडरों का सौदा करते हैं
कबरों का मुआवजा ढूँढ़ते हैं।

अब किसी की नासमझी पे कोई कितनी बार तंज़ करे 

जिनके आँगन में सूरज रहता है
वोह जुगनुओं को ढूँढ़ते हैं

तू सबके अन्दर रहती है
चारो तरफ तो दिखती है
वोह फिर भी समझ नहीं पाते हैं
जो किताबों में तुझको ढूँढ़ते हैं

ज़िन्दगी तुझमे भी लोग अब ख़ास और ताज़ा ढूँढ़ते हैं
समझदार हैं, अँधेरे में रंग काला ढूँढते हैं

आज उसका चेहरा याद आगया

आज उसका चेहरा याद आगया
जिसने इक रोज़ मेरी कवितायें
यह कह कर लौटा दी थीं 
के तुम्हारे पास शब्दों की कमी है
ख्याल उलझे हुए हैं
आज अपनी बड़ी सी इक तस्वीर
उसके घर के बाहर टांग आया हूँ

जिसपर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा है
आज का अखबार न पढ़ना  !!

कचहरी यहाँ कोई नहीं है

कचहरी यहाँ  कोई नहीं है, सवाल हैं मगर
वकील भी नहीं हैं पर,  दलील है मगर

दुश्मनी नहीं है कोई, इलज़ाम हैं मगर
सजा देना रिवाज़ नहीं, गुनाहगार है मगर 

कटघरे में खड़ा है जो, वही तुम्हारा मुजरिम  है
दोस्त है तो क्या हुआ, कातिल है मगर

जिंदा रखनी है दोस्ती तो
इन्साफ की फरयाद न कर

कचहरी यहाँ कोई नहीं है, बस सवाल हैं मगर !! 
बजुर्ग और तख्ती 

बजुर्ग और तख्ती

                                    


चल दौड़
देख वो पतंग कटने को है 

बहुत देर से लहरा रही थी
बड़ी ही सख्त डोर पे थी शायद
बीच में एक दो तूफां भी आये
पर वो अपनी धुन में  

अपने मालिक की ऊँगली पे नाचती रही
देखना उसे इस बात 
पर इनाम मिलेगा।

चल भाग पुरानी गली के पास
कोई जिंदगी के राज़ बता रहा है
कहते हैं कोई बज़ुर्ग है
झुकी हुई कमर, दिखता भी कम है
इक कागज़ हाथ में पकडे हुए
जिसपर अरबी में जवानी लिखा है  
जो कोई मिलता है, उससे पूछता है,
"इसे कहीं देखा तो नहीं"
कोई पागल बूड़ा समझ कर हस देता है
कोई समझता है
चचा का शरारत करने का मन हो रहा है।
सवाल में छुपे जवाब को समझने वाले
अमीर होकर घर घर लौट रहे हैं
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े खड़े
बस तंज़ करते रह जाते हैं
                                                                 के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

मैंने पास जाकर पुछा क्या माजरा क्या है
बोला थक गया हूँ इसे ढूँढ़ते ढूँढ़ते
हिम्मत भी हार चुका हूँ
पर इच्छा नहीं मरती।

बारिश देखकर भीगने का मन होता है  
पेड़ पे अटकी पतंग देखकर जी करता है के
बस लपक लूं
पर उसका कटा मांझा मेरे पाँव की उँगलियों को छु कर
चला जाता है, और मैं पकड़ नहीं पाता 
यह भी कोई उम्र है यह सब करने की
हर दिन शरीर और मन की
इस लड़ाई से तंग आ गया हूँ
शरीर बूढा हो गया है,
पर आत्मा अभी भी मनचली है। 

अब छोड़ो यह सब क्या है
कितना और चलना है,
अब तो दिखना भी बंद हो गया है  

जूनून, हिम्मत, सपने, मंजिल सब ख्याली चीज़ें होती हैं
मुझे उस फ़क़ीर की बात है
मोहब्बत में शर्तें नहीं होतीं
कुछ नहीं है बस वही है
सब कुछ है तो भी वही है 

दरिया के साथ दुश्मनी और पानी के साथ दोस्ती
इन्सां कितना समझदार हो गया है
पर उसे चालाकी पसंद नहीं 
रास्ता एक ही है, उस तरफ जाने का
उसके बिना जाना, या उसका होकर जाना
फैसला तुम्हारा है, सिला भी तुम्हारा ही होगा   

अब वापस चलें
यहाँ तो पानी का कोई कुआं भी नहीं है
प्यासे मर गए तो
ज़िन्दगी की तरह मौत भी बेमतलब हो जाएगी
पानी पीते हैं, तय्यारी करते हैं, और फिर निकलते है
और अब की बार याद रखना 
उसे ज़िद पसंद नही,दीवाने पसंद हैं
चलो इतनी रौशनी बहुत है। 

सुना है वो बूढ़ा अँधेरा होने पे वो कागज़ जला देता है
राख को हलकी सी फूँक मार के,
एक थकी सी हसी चेहरे पे ओड़कर सो जाता है 
कुछ पल उजाला होता है, और फिर अँधेरा पसर जाता है 
सुबह किसी कटी पतंग के कागज़ पर
अरबी में जवानी लिखकर दिन शुरू करता है
किसी एक के कान में बात डाल  देता है
के उसके पास कुछ  राज़ हैं
किस्मत का पता है।
वो हर दिन यही करता है
जो पता मांगने आते  हैं
उनसे सवाल करता है
समझदार सवाल में  छिपा जवाब देख लेते है
और कुछ  नौजवां कोने में खड़े रहकर
यही तंज़ करते रह जाते हैं
के ज़िन्दगी के राज़ भी भला कागज़ पे लिक्खे मिलते हैं। 

                                                                                              रमणीक

Monday, 29 July 2013

वहां अब कोई नहीं रहता।



जब जब  तलब उठती है
दौड़ के पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता हूँ
इस सड़क पर पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
वहां अब 
कोई नहीं रहता।

कभी कभी बारिश के मौसम में
एक कारीगर आता है
दीवारों पे निकली सीलन और दरारों को छुपाने
के लिए बाहर बाहर से पुताई करके चला जाता है
 

नजाने कितने साल हो गये, उस घर के दरवाजों को खुले हुए
सोफों पर, कुर्सियों पर, धूल  के पहाड़ जम चुके होंगे
 

मेरा इस घर से कोई वास्ता नहीं है 

एक सावन, तूफां के हाथों
ऊपर वाले कमरे की खिड़की 
टूट गयी थी 
उसका कांच अभी भी  बाहर दरवाज़े के पास रक्खा है
सांस थाम कर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ
दरारों के  बीच खुद को तलाशने की इक और कोशिश करता हूँ 

पर  इससे पहले के खुद को देख लू, पहचान लूं 
चौकीदार अपने डंडे को जोर से ज़मीन पर पटकता है
और
मैं हर बार की तरह ज़हन में
कोई अधूरा जवाब लेकर लौट आता हूँ।

दरअसल उस घर में, सालों से बंद खिड़की दरवाजों के भीतर
उन धूल के पहाड़ों के नीचे
एक छोटी सी कहानी दफन है
बहुत अरसा पहले, इसी मौसम में
इक कमसिन, नादां सी लड़की ने
जो छुट्टियां मनाने आई थी
खेल खेल में
इसी मोहल्ले के एक लड़के से यह पूछ लिया था
के क्या वोह उसका गुड्डा बनेगा। 


लड़का भी उसकी मानिंद मासूम था
थोडा शर्मीला था 

जवाब पकाने में उसे थोडा वक़्त लगा
पर जब तक वोह हिम्मत जुटाता
उस लड़की की छुटियाँ ख़तम हो चुकी थीं 
उसके बाद कई मौसम बीते, साल, महीने, दिन 
उस घर के दरवाजों पे धूल जमती रही, 

लॉन का घास बढ़ता रहा।
उस कारीगर के अलावा उस घर में कोई नहीं आया।

हाँ वो लड़का, जब जब तलब उठती है
बस कांच के टुकड़ों से जवाब मांगने के लिए
दौड़ के उस पीले वाले मकान के बाहर खड़ा हो जाता है
इस सड़क पे पड़ती ढलान वाली गली का सबसे निचला मकान है
जहाँ अब कोई नहीं रहता। 

तुम अभी भी मुस्कुराना नहीं भूले


तुम अभी तक मुस्कुराना नहीं भूले 
अब वो घोंसला नहीं रहा, वो परिंदा नही रहा।

तुम अभी भी हक़ जताना नही भूले
अब वो शाख़ नहीं रही, वो पेड़ नहीं रहा।

अभी तक ख्यालों को हकीकत के कपड़े पहना रक्खे हैं
अब वो रंग नहीं रहे, वो केनवस नहीं रहा।

खुश-मिजाज़ी से तकलीफ का इज़हार ही सियासत है
तुम्हे हमपर यकीं न रहा, हमे तुमपर यकीं न रहा।

Wednesday, 15 May 2013

शेहरी कुत्ता



वो अभी भी बैठा है 
ठीक तुम्हारे पीछे 
 लार टपक रही है
पेट भरा है पर शायद आँख नहीं 
पिछली शाम उसकी हड्डी
शाही हड्डी जिसपर वो कई दिनों से अपना काम चला रहा था 
ख़तम हो गयी है
महंगा
खरीदा था , पर अब रिवाज़ चला गया,
तो उसे घर से निकाल दिया 
जब से आवारा हुआ है 
किसी किसी की रोटी पे नज़र रहती है उसकी 
..... रोटी के लिए मशक्कत करने का आदि नहीं है

और शेहरी कुत्ते समझदार भी होते हैं
दिन भर शेर की तरह, चौड़े होकर खड़े रहते हैं
भौंकते नहीं हैं, सिर्फ गुरर्राते हैं 
अकड़ सिर्फ इंसानों की ही जागीर नहीं होति….


 रात होते ही किसी भी नौकर के पाँव चाटते हैं
कुत्ते हैं, जिसके हाथ में हड्डी वही मालिक

और अब तो गले में चमकदार पट्टा भी रहा
तोह देखने वाला हर कोई आवारा समझता है
फेंकी हुई ब्रेड रोटी सब रात में  खाता हैं
और दिन भर एक ही काम करता हैं
किसी ऐसे कुत्ते की तलाश, जिसके पास कोई मज्जेदार हड्डी हो

पर अब की बार एक फ़क़ीर के ठीक पीछे बैठा है
नज़र उसके थैले पे है, बस दिन ढलने का इंतज़ार कर रहा है
पर उसे मालूम नहीं के पीछे की बजाये वोह अगर आगे बैठे
तोह फ़क़ीर खुद ही पोटली खोल के उसके आगे रख देगा
पर कोई नहीं, एक तो कुत्ता है, ऊपर से शेहरी,
इतनी नासमझी तोह जायज़ है